टीआरपी को मीडिया इन्डस्ट्री का अंतिम सत्य माननेवाले कमर वहीद नकवी साहब सहित आजतक टीम की हालत इन दिनों इसी टीआरपी ने पस्त कर रखी है। वो लगातार इसी टीआरपी से पिछले चार सप्ताह से भी ज्यादा से लहुलूहान होते आए हैं। इस बीच चैनल नें अपने को नंबर वन पर लाने के लिए तमाम तरह के हथकंड़े अपनाए और दुनियाभर के हाथ-पैर मारे। इसी छटपटाहट में उसने एक तरफ अपने को इंडिया टीवी के संस्कार में ढालने की कोशिश की तो दूसरी तरफ ऑपरेशन हे राम के जरिए अपने पुराने तेवर में भी लौटने का प्रयास किया। आजतक की ये कोशिश उसकी बेचैनी को साफ बयान कर देती है कि वो अपनी इस हालात को लेकर कितना कनफ्यूज है? वो इस बात को तय ही नहीं कर पा रहा है कि ऑडिएंस उसके इंडिया टीवी बन जाने से ज्यादा जुट पाएंगे या फिर पुराने आजतक की शक्ल में लौटने पर? हमारी जैसी ऑडिएंस भी इसके इंडिया टीवी की शक्ल में आने पर घबराने लग गयी कि बस एक ही उल्लू काफी है,बर्बाद ए गुलिस्ता करने को,हर साख पे उल्लू बैठा है,अंजाम ए गुलिस्ता क्या होगा वाला मामला होता जा रहा है तो फिर न्यूज कल्चर का आगे क्या हाल होगा?
लेकिन इसी ऑडिएंस ने ऑपरेशन हे राम देखकर मन ही मन शुभकामना भी जाहिर किया और आगे चलकर फेसबुक पर लिखा कि- आजतक की ऑपरेशन हे राम के जरिए देश के अय्याश और दलाल बाबाओं पर की गयी स्टोरी जबरदस्त है। इस स्टोरी के जरिए उसे इस सप्ताह अच्छी टीआरपी मिलेगी। इस स्टोरी को पहले हमने टेलीविजन पर देखा और जो हिस्से छूट गए उसे उसकी ऑफिशियल साइट पर अपलोड किए गए वीडियो के जरिए देखा। ये और बाद है कि चैनल ने इसे बाद में स्टिंग से ज्यादा रायता में तब्दील कर दिया और अगले दिन भी फैलाता रहा। स्टोरी देखने के बाद हम उम्मीद कर रहे थे कि अगले दिन तक हंगामा मच जाएगा। देशभर में आग लग जाएगी,दंगे की शक्ल में देश जल उठेगा। इस देश में जहां हर पीपल का पेड़ अपनी पैदाइश के साथ एक मंदिर का भविष्य लेकर आता है और एक बेरोजगार के बाबा हो जाने की गारंटी देता है वहां आसाराम बापू,सुधांशु महाराज,महाकाल और दाती महाराज जैसे महंत को बेनकाब कर देने से स्थिति सामान्य नहीं रह जाएगी। वैसे भी हमने आज तक के कम से कम आधे दर्जन स्टिंग ऑपरेशन के असर को तो देखा ही है जिससे पूरा देश हिल गया है। हम अगले पांच घंटे और अगले दिन तक चैनल के 6-8 विंडो में कटकर देशभर की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और ये स्टिंग हवा में उड़ गया। बासी स्टिंग ऑपरेशन ने कुछ असर नहीं किया।
ये वो नाजुक मौका है जिस पर आजतक को सीरियसली सोचना चाहिए कि आखिर क्यों उसके इस स्टिंग ऑपरेशन को लोगों ने पाद धरकर उड़ा दिया,उस पर गौर नहीं किया, हंगामा क्यों नहीं बचा। ये सबसे बड़ा चिन्ह है जो ये बताता है कि आजतक की ब्रांडिंग और उसकी विश्वसनीयता झरझराकर गिर गयी है। इस पर सिर्फ एडीटोरियल की टीम को ही नहीं,बल्कि मार्केटिंग के लोगों को भी लगना होगा। पैकेज पर काम करने के साथ ही ब्रांड वैल्यू और रीस्टैब्लिशमेंट पर भी ध्यान देना होगा।
बहरहाल आजतक खबरों और कंटेंट के स्तर पर जहां रद्दोबदल कर रहा है जिसे हम उसका कन्फ्यूज्ड हो जाना कह रहे हैं,वही लोगों की जिम्मेदारी तय करने में भी भारी फेरबदल कर रहा है। चैनल की भाषा में कहें तो वो वास्तुशास्त्र के हिसाब अपने चैनल को दुरुस्त करने में जुटा है। संभव है उसे साढ़े साती की चपेट में आने का भान हो रहा है। वास्तुशास्त्र के हिसाब से दो स्तर के बदलाव होते हैं। एक तो ये कि जो भीतरी स्ट्रक्चर है,उसमें ही फेरबदल कर दिया जाय- जैसे जो बेडरुम है,उसे बाथरुम बना दिया जाए और जो बेडरुम है उसमें एक चापानल या लोहे की कोई चीज जड़ दी जाए। मतलब जहां लिखा है प्यार,वहां लिख दो सड़क टाइप से बदलाव जिसका खूबसूरती और यूटिलिटी से तो कोई मतलब न हो बल्कि कबाड़ा ही हो लेकिन वास्तुशास्त्र के लिहाज से ये जरुरी है। चैनल ने फिलहाल ये बदलाव भीतरी स्ट्रक्चर के हिसाब से ही किया है।
सबसे बड़ा बदलाव कि अजय कुमार जो कि अबतक आजतक के आउटपुट हेड हुआ करते थे,उन्हें अब रिपोर्टिंग के हिस्से से जुड़े होंगे बोलकर झूलता छोड़ दिया गया है,आगे का पद क्या होगा,अभी तय नहीं है जबकि कमान अभी अशोक सिंघल के ही हाथ रहेगी। ये अजय कुमार के कद को कतरकर छोटा करने का काम हुआ। इसका साफ मतलब है कि अजय कुमार पर से आजतक का भरोसा उठ गया। इनके बारे में चंद जरुरी लाइनें आगे।..फिलहाल,शैलेन्द्र झा जो कि तेज के हेड हुआ करते थे अब उन्हें अजय कुमार की जगह आजतक का आउटपुट हेड बना दिया गया है जबकि स्पोर्टस कवर करती आयी पूनम शर्मा को तेज का हेड बना दिया गया है। लोगों को ये बदलाव संभव हो कि बहुत ही अटपटा लग रहा हो लेकिन अगर वास्तुशास्त्र का यही उचित विधान है तो इस अटपटेपन का क्या कीजिएगा? संभव हो कि अजय कुमार इस अल्टरेशन को आनेवाले समय में चलते-चलते मेरे ये गीत,याद रखना के सीन के तौर पर ले रहे हों तो वहीं शैलेन्द्र झा और पूनम शर्मा को इस प्रोमोशन से अपने भीतर छिपी प्रतिभा, आंचल में बंधे तो भी चंदन,आग में जले तो भी चंदन जैसी लग रही हो। लेकिन
एन्टीएन्क्रीमेंट के माहौल में उनका ये प्रोमोशन बाकी लोगों को कितनी रास आएगी,चैनल के भीतर के माहौल के लिहाज से ये भी एक बड़ा सवाल है। अभी चैनल के भीतर भारी अफरा-तफरी मची हुई है। लोगों पर गहरी नजर रखी जा रही है और तय किया जा रहा है कि ये बंदा/बंदी शक्ल से ही लग रहा/रही है कि टीआरपी मजबूत करने के काम आएगा,इसे प्रोमोट करो।..न न ये तो अजय कुमार की ही कार्बन कॉपी है,इसे थोड़ा ऑल्टर करो। ऐसे माहौल में एक तो एंटीइन्क्रीमेंट और दूसरा कि कद छोटा किए जाने,हालत यही रही तो शैक कर दिए जाने के डर के बीच टीआरपी कितनी बढ़ेगी,ये चैनल के भीतर आतंकवाद से भी बड़ी समस्या है। लेकिन अगर ये सारे बदलाव टोटके के तौर पर आजमाए जा रहे हैं तो समझिए कि चैनल नें मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर एक नए खेल को जन्म दिया है- आओ खेलें कोना-कोनी बदलने का खेल।
भीतरी स्ट्रक्चर में हेर-फेर करने पर अगर चैनल को वास्तुशास्त्र का लाभ न मिला तो संभव है कि गणपति बप्पा विसर्जन और मां दुर्गा की स्थापना के बीच तक आजतक के भीतर किसी बड़े बाबा की प्राण प्रतिष्ठापना हो जाए। इसे लेकर फिजा में स्टार न्यूज से इम्पोर्ट करने की खबर भी है जो कि कभी यहीं से एक्सपोर्ट हुए।.
अब अजय कुमार को लेकर कुछ छूट गयी लाइनें।..आजतक में इन्क्रीमेंट के सवाल को लेकर जब मैंने लिखा कि आजतक में कई नत्था लालबहादुर के भरोसे जी रहे हैं तो हमें एक पुराने मीडियाकर्मी ने अजय कुमार की प्रोफाइल को लेकर विस्तार से जानकारी दी। उसमें उन्होंने बताया कि वो सिविल सर्विसेज बैग्ग्राउंज से आते हैं,उन्होंने सिविल सर्विसेज के लिए आइआएएम लखनउ की अधूरी पढ़ाई छोड़ दी। फिर जर्नलिज्म के लिए सिविल सर्विसेज को बाय कर दिया। उनका ऐसा बताने में संभव है कि ये समझाने का आग्रह रहा हो कि चैनल ने अजय कुमार के महत्व को समझा ही नहीं। लेकिन सवाल तो ये भी है कि अजय कुमार ने आइआइएम और सिविल सर्विसेज के अनुभव से क्या सीखा? मोहल्लालाइव पर नागार्जुअन ने अपनी कालजयी पोस्ट में अजय कुमार की क्षमता का अतिरेक में ही सही लेकिन आकलन कर दिया है। एंकरिंग करने के दौरान भी मैंने कई बार महसूस किया है कि अजय कुमार जिस अंदाज में ज्ञान देने की मुद्रा में आते हैं,वो चैनल की ट्रेनिंग न होकर इन्हीं प्रोफेशन की ट्रेनिंग है जिसे कि डेप्थ के नाम की ब्रांडिंग की जाती है जो आजतक जैसे चैनल के किसी काम की नहीं है। हां, ऑपरेशन हे राम में बेहतर अदकारा साबित हुए। फिर हमें दूसरे सूत्रों से जानकारी मिली कि वो टीटीएम कला( ताबड़तोड़ तेल मालिश) में भी निपुण रहे हैं जो कि चैनल कल्चर के लिए योग्यता से ज्यादा जरुरी चीज है बल्कि ये भी योग्यता ही है। फिर ये टोटका उन्हीं के साथ क्यों लागू किया गया? हमें फिर वही कहावत याद आती है- झाड-फूंक में सबसे बेशकीमती चीज ही तो चढ़ायी जाती है न बबुआ।..
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लेकिन इसी ऑडिएंस ने ऑपरेशन हे राम देखकर मन ही मन शुभकामना भी जाहिर किया और आगे चलकर फेसबुक पर लिखा कि- आजतक की ऑपरेशन हे राम के जरिए देश के अय्याश और दलाल बाबाओं पर की गयी स्टोरी जबरदस्त है। इस स्टोरी के जरिए उसे इस सप्ताह अच्छी टीआरपी मिलेगी। इस स्टोरी को पहले हमने टेलीविजन पर देखा और जो हिस्से छूट गए उसे उसकी ऑफिशियल साइट पर अपलोड किए गए वीडियो के जरिए देखा। ये और बाद है कि चैनल ने इसे बाद में स्टिंग से ज्यादा रायता में तब्दील कर दिया और अगले दिन भी फैलाता रहा। स्टोरी देखने के बाद हम उम्मीद कर रहे थे कि अगले दिन तक हंगामा मच जाएगा। देशभर में आग लग जाएगी,दंगे की शक्ल में देश जल उठेगा। इस देश में जहां हर पीपल का पेड़ अपनी पैदाइश के साथ एक मंदिर का भविष्य लेकर आता है और एक बेरोजगार के बाबा हो जाने की गारंटी देता है वहां आसाराम बापू,सुधांशु महाराज,महाकाल और दाती महाराज जैसे महंत को बेनकाब कर देने से स्थिति सामान्य नहीं रह जाएगी। वैसे भी हमने आज तक के कम से कम आधे दर्जन स्टिंग ऑपरेशन के असर को तो देखा ही है जिससे पूरा देश हिल गया है। हम अगले पांच घंटे और अगले दिन तक चैनल के 6-8 विंडो में कटकर देशभर की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और ये स्टिंग हवा में उड़ गया। बासी स्टिंग ऑपरेशन ने कुछ असर नहीं किया।
ये वो नाजुक मौका है जिस पर आजतक को सीरियसली सोचना चाहिए कि आखिर क्यों उसके इस स्टिंग ऑपरेशन को लोगों ने पाद धरकर उड़ा दिया,उस पर गौर नहीं किया, हंगामा क्यों नहीं बचा। ये सबसे बड़ा चिन्ह है जो ये बताता है कि आजतक की ब्रांडिंग और उसकी विश्वसनीयता झरझराकर गिर गयी है। इस पर सिर्फ एडीटोरियल की टीम को ही नहीं,बल्कि मार्केटिंग के लोगों को भी लगना होगा। पैकेज पर काम करने के साथ ही ब्रांड वैल्यू और रीस्टैब्लिशमेंट पर भी ध्यान देना होगा।
बहरहाल आजतक खबरों और कंटेंट के स्तर पर जहां रद्दोबदल कर रहा है जिसे हम उसका कन्फ्यूज्ड हो जाना कह रहे हैं,वही लोगों की जिम्मेदारी तय करने में भी भारी फेरबदल कर रहा है। चैनल की भाषा में कहें तो वो वास्तुशास्त्र के हिसाब अपने चैनल को दुरुस्त करने में जुटा है। संभव है उसे साढ़े साती की चपेट में आने का भान हो रहा है। वास्तुशास्त्र के हिसाब से दो स्तर के बदलाव होते हैं। एक तो ये कि जो भीतरी स्ट्रक्चर है,उसमें ही फेरबदल कर दिया जाय- जैसे जो बेडरुम है,उसे बाथरुम बना दिया जाए और जो बेडरुम है उसमें एक चापानल या लोहे की कोई चीज जड़ दी जाए। मतलब जहां लिखा है प्यार,वहां लिख दो सड़क टाइप से बदलाव जिसका खूबसूरती और यूटिलिटी से तो कोई मतलब न हो बल्कि कबाड़ा ही हो लेकिन वास्तुशास्त्र के लिहाज से ये जरुरी है। चैनल ने फिलहाल ये बदलाव भीतरी स्ट्रक्चर के हिसाब से ही किया है।
सबसे बड़ा बदलाव कि अजय कुमार जो कि अबतक आजतक के आउटपुट हेड हुआ करते थे,उन्हें अब रिपोर्टिंग के हिस्से से जुड़े होंगे बोलकर झूलता छोड़ दिया गया है,आगे का पद क्या होगा,अभी तय नहीं है जबकि कमान अभी अशोक सिंघल के ही हाथ रहेगी। ये अजय कुमार के कद को कतरकर छोटा करने का काम हुआ। इसका साफ मतलब है कि अजय कुमार पर से आजतक का भरोसा उठ गया। इनके बारे में चंद जरुरी लाइनें आगे।..फिलहाल,शैलेन्द्र झा जो कि तेज के हेड हुआ करते थे अब उन्हें अजय कुमार की जगह आजतक का आउटपुट हेड बना दिया गया है जबकि स्पोर्टस कवर करती आयी पूनम शर्मा को तेज का हेड बना दिया गया है। लोगों को ये बदलाव संभव हो कि बहुत ही अटपटा लग रहा हो लेकिन अगर वास्तुशास्त्र का यही उचित विधान है तो इस अटपटेपन का क्या कीजिएगा? संभव हो कि अजय कुमार इस अल्टरेशन को आनेवाले समय में चलते-चलते मेरे ये गीत,याद रखना के सीन के तौर पर ले रहे हों तो वहीं शैलेन्द्र झा और पूनम शर्मा को इस प्रोमोशन से अपने भीतर छिपी प्रतिभा, आंचल में बंधे तो भी चंदन,आग में जले तो भी चंदन जैसी लग रही हो। लेकिन
एन्टीएन्क्रीमेंट के माहौल में उनका ये प्रोमोशन बाकी लोगों को कितनी रास आएगी,चैनल के भीतर के माहौल के लिहाज से ये भी एक बड़ा सवाल है। अभी चैनल के भीतर भारी अफरा-तफरी मची हुई है। लोगों पर गहरी नजर रखी जा रही है और तय किया जा रहा है कि ये बंदा/बंदी शक्ल से ही लग रहा/रही है कि टीआरपी मजबूत करने के काम आएगा,इसे प्रोमोट करो।..न न ये तो अजय कुमार की ही कार्बन कॉपी है,इसे थोड़ा ऑल्टर करो। ऐसे माहौल में एक तो एंटीइन्क्रीमेंट और दूसरा कि कद छोटा किए जाने,हालत यही रही तो शैक कर दिए जाने के डर के बीच टीआरपी कितनी बढ़ेगी,ये चैनल के भीतर आतंकवाद से भी बड़ी समस्या है। लेकिन अगर ये सारे बदलाव टोटके के तौर पर आजमाए जा रहे हैं तो समझिए कि चैनल नें मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर एक नए खेल को जन्म दिया है- आओ खेलें कोना-कोनी बदलने का खेल।
भीतरी स्ट्रक्चर में हेर-फेर करने पर अगर चैनल को वास्तुशास्त्र का लाभ न मिला तो संभव है कि गणपति बप्पा विसर्जन और मां दुर्गा की स्थापना के बीच तक आजतक के भीतर किसी बड़े बाबा की प्राण प्रतिष्ठापना हो जाए। इसे लेकर फिजा में स्टार न्यूज से इम्पोर्ट करने की खबर भी है जो कि कभी यहीं से एक्सपोर्ट हुए।.
अब अजय कुमार को लेकर कुछ छूट गयी लाइनें।..आजतक में इन्क्रीमेंट के सवाल को लेकर जब मैंने लिखा कि आजतक में कई नत्था लालबहादुर के भरोसे जी रहे हैं तो हमें एक पुराने मीडियाकर्मी ने अजय कुमार की प्रोफाइल को लेकर विस्तार से जानकारी दी। उसमें उन्होंने बताया कि वो सिविल सर्विसेज बैग्ग्राउंज से आते हैं,उन्होंने सिविल सर्विसेज के लिए आइआएएम लखनउ की अधूरी पढ़ाई छोड़ दी। फिर जर्नलिज्म के लिए सिविल सर्विसेज को बाय कर दिया। उनका ऐसा बताने में संभव है कि ये समझाने का आग्रह रहा हो कि चैनल ने अजय कुमार के महत्व को समझा ही नहीं। लेकिन सवाल तो ये भी है कि अजय कुमार ने आइआइएम और सिविल सर्विसेज के अनुभव से क्या सीखा? मोहल्लालाइव पर नागार्जुअन ने अपनी कालजयी पोस्ट में अजय कुमार की क्षमता का अतिरेक में ही सही लेकिन आकलन कर दिया है। एंकरिंग करने के दौरान भी मैंने कई बार महसूस किया है कि अजय कुमार जिस अंदाज में ज्ञान देने की मुद्रा में आते हैं,वो चैनल की ट्रेनिंग न होकर इन्हीं प्रोफेशन की ट्रेनिंग है जिसे कि डेप्थ के नाम की ब्रांडिंग की जाती है जो आजतक जैसे चैनल के किसी काम की नहीं है। हां, ऑपरेशन हे राम में बेहतर अदकारा साबित हुए। फिर हमें दूसरे सूत्रों से जानकारी मिली कि वो टीटीएम कला( ताबड़तोड़ तेल मालिश) में भी निपुण रहे हैं जो कि चैनल कल्चर के लिए योग्यता से ज्यादा जरुरी चीज है बल्कि ये भी योग्यता ही है। फिर ये टोटका उन्हीं के साथ क्यों लागू किया गया? हमें फिर वही कहावत याद आती है- झाड-फूंक में सबसे बेशकीमती चीज ही तो चढ़ायी जाती है न बबुआ।..
इस तरह टुकड़ों-टुकड़ों में,अलग-अलग जगहों पर हिन्दी को मरी हुई क्यों करार देते हैं? हिन्दी के विकास के नाम पर ऐश करने का काम जब सामूहिक तौर पर होता आया है तो उसके नाम की मर्सिया पढ़ने का काम क्यों न सामूहिक हो? इस प्रोजोक्ट में बेहतर हो कि एक नीयत जगह पर उसके नाम का मकबरा बनाया जाए जहां 14 सितंबर के नाम पर लोग आकर अपनी-अपनी पद्धति से मातम मनाने,कैंडिल जलाने का काम करें। कोशिश ये रहे कि इसे अयोध्या-बाबरी मस्जिद की तरह सांप्रदायिक मामला न बनाकर मातम मनाने की सामूहिक जगह के तौर पर पहचान दिलाने की कोशिश हो। वैसे भी पूजा या इबादत की जगह सांप्रदियक करार दी जा सकती है, मातम मनाने के लिए इसे सांप्रदायिक रंग-रोगन देने की क्या जरुरत? बेहतर होगा कि इसे कबीर की तरह अपने-अपने हिस्से का पक्ष नोचकर मंदिर या मस्जिदों में घुसा लेने के बजाय खुला छोड़ दिया जाए। देश में कोई तो एक जगह हो जो कि शोक के लिए ही सही सेकुलर( प्रैक्टिस के स्तर पर ये भी अपने-आप में विवादास्पद अवधारणा है लेकिन संवैधानिक है इसलिए) करार दी जाए। बस मूल भावना ये रहे कि ये जगह उन तमाम लोगों के लिए उतनी ही निजी है जितनी कि किसी के सगे-संबंधी के गुजर जाने पर उसके कमरे की चौखट,तिपाई,चश्मा,घाघरा जिसे पकड़कर वो लगातार रोते हैं।
जिनके लिए हिन्दी बाजार के हाथों लगातार कुचली जाकर,पूंजीवाद के माध्यम से छली जाकर और अब इंटरनेट के दंगाइयों के संसर्ग में आकर अधमरी या पूरी तरह मर गयी है,उन्हें इसके विकास का राग अलपाने और जर्जर कोशिश करने के बजाय इसकी मौत की विधि-आयोजनों में शामिल हो जाना चाहिए। हिन्दी दिवस के नाम पर जबरदस्ती के उत्सवधर्मी रंगों के बैनर टांगकर अंदर सेमिनार हॉलों में टेसू बहाने से अच्छा है कि वे घर बैठकर सादगी से मातम मनाने का काम करें। कुछ नहीं तो कम से कम सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये तो बचेंगे। बाकी जिन्हें लगता है कि हिन्दी का लगातार विस्तार हो रहा है,वो ऐसी बातें सेमिनार और आयोजनों के बूते ऐसा नहीं कह रहे बल्कि वो अपने-अपने व्यक्तिगत स्तर पर ऐसा लगातार कर रहे हैं। हमारी अपील बस इतनी भर है कि जिन्हें हिन्दी मरती हुई नजर आती है,खासकर सालभर में केवल एक सप्ताह तक,जो पेशेवर तौर पर छाती पिटनेवाले लोग हैं,उन्हें इसे बेहतर करने के प्रयास आज से ही छोड़ देने चाहिए। वेवजह में हर साल उम्मीदों का पखाना छिरियाते हैं और अगले साल तक जिसकी बदबू अकादमियों में बजबजायी रहती है,जिसे ठोस रुप देने के लिए लाखों के खर्चे होते हैं।
कुछ साल तक हिन्दी जिस हाल में है,उसे उसी हाल में छोड़कर देखिए,व्यक्तिगत स्तर पर जो लोग जैसा कर रहे हैं केवल उन्हें ऐसा करने की छूट दे दें,फिर देखिए कि हिन्दी को चील-कौए खाते हैं या फिर हिन्दी सद्यस्नात: स्त्री( तुरंत नहाकर बाथरुम से निकली हुई) की तरह खिलकर हमारे सामने आती है।
मेरी अपनी समझ है कि हिन्दी की सेहत अव्वल तो पहले से बेहतर हुई है,पहले जो रघुवीर सहाय की दुहाजू बीबी हुआ करती थी,अब ज्यादा स्लीम ट्रीम हुई है। अब अगर ये अनमैरिड है तब तो सौन्दर्य के सैंकड़ों पैमाने उस पर अप्लाय कर दें लेकिन विवाहित भी है तो उसका रुप उन विवाहित स्त्रियों की तरह है जो रियलिटी शो के फैशन शो या डांस कॉम्पटीशन में शामिल होने के लिए कुलांचे भर रही है। जिस बाजार की हिन्दी समाज के अधिकांश आलोचक पानी पी-पीकर गरिआते हैं,उसी बाजार ने इसे एक प्रोफेशनल एटीट्यूड दिया है। अब वो अपने दम पर अपनी पेट भरने की हैसियत में आने लगी है। अब वो संस्थानों के पराश्रित नहीं है। आप चाहें तो हिन्दी की इस बदलती हालत पर स्त्री विमर्श के डॉमेस्टिक लेवर और मार्केट लेवर कॉमडिटी के तहत विश्लेषित कर हिन्दी की सेवाभावना को एक ठोस मनी वैल्यू निकाल सकते हैं। घरेलू हिंसा और सांस्थानिक जबरदस्ती से स्त्रियों के मुक्त होने की तरह ही आज की हिन्दी को समझ सकते हैं।
वर्चुअल स्पेस के जिन बलवाइयों से हिन्दी के गिद्ध-जड़ आलोचकों को खतरा है,उन वलवाइयों के पास इतनी तमीज तो जरुर है कि जिस हिन्दी के साथ वो खाते-पीते,डेटिंग करते हैं,उसे हमराज मानते हैं,उसकी लुक्स को फिट रखे। वर्चुअल स्पेस के वलवाईयों ने हिन्दी को इसी रुप में विस्तार दिया है जो कि ग्लोबल स्तर पर जाकर भी मैं हिन्दी हूं कहकर शान से अपना परिचय दे सकें। फिलहाल मैं इस बहस में बिल्कुल नहीं पड़ना चाहता कि ऐसा करते हुए इन लोगों ने वर्तनी,शिल्प,संरचना और शब्दों के स्तर पर कितना कबाड़ा किया है,सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि आज अगर हिन्दी दबी जुबान में बोलनेवाली भाषा एक हद तक नहीं रह गयी है( इसे ज्यादा मजबूती से कहना ज्यादती होगी) जिसकी क्रेडिट खुद हिन्दी के गिद्ध-सिद्ध आलोचक भी लेने में नहीं चूकते तो इसमें इनलोगों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संभव है कि इस स्पेस पर लिखनेवाले लोगों ने अज्ञेय की तरह प्रतीक और बिंब न गढ़े हों,मुक्तिबोध की तरह कोई सभ्यता-समीक्षा न प्रस्तावित की हो, निराला की तरह छंदों को नहीं साधा हो लेकिन मौजूदा परिवेश में उसने हिन्दी के भीतर जितनी कॉन्फीडेंस पैदा की है,उस पर गंभीरता से बात करने की जरुरत है। तो भी..
जिस किसी को हिन्दी भ्रष्ट होती हुई,छिजती हुई नजर आती है तो यकीन मानिए उसकी ये हालत सबसे ज्यादा उन्हीं लोगों के हाथों हुई है जिनके उपर इसे सेहतमंद रखने का जिम्मा डाला गया या फिर उन्होंने रोजी-रोटी के चक्कर में ये जिम्मेदारी अपने आप ले ली। अभी सप्ताह भर भी नहीं हुए कि राजभाषा समिति की रिपोर्ट अंग्रेजी में आने पर भारी हंगामा मचा। पिछले साल इस समिति से संबंद्ध पी.चिदमबरम के अंग्रेजी में भाषण दिए जाने पर छीछालेदर हुई। हिन्दी को बेहतर बनानेवाले पहरुओं ने इसे एक सहज भाषा के तौर पर विस्तार देने के बजाय इसे अपने कुचक्रों से एक अंतहीन समस्या के तौर पर तब्दील कर दिया। अगर किसी राजनीतिक विश्लेषक के आगे आतंकवाद,कश्मीर जैसी समस्याएं,तमाम प्रशासनिक सक्रियताओं के वावजूद एक अंतहीन समस्या जैसी जान पड़ती है तो भाषा पर बात करनेवालों के लिए हिन्दी की समस्या कुछ इसी तरह है। हिन्दी के पहरुओं ने इसका बंटाधार क्रमशः दो स्तरों पर किया है। एक तो ये कि उन्होंने एक जड़ समझ विकसित कर ली है कि हिन्दी का मतलब अधिक से अधिक तत्सम शब्दों का प्रयोग है.अंग्रेजी शब्दों का हिन्दी अनुवाद है और दूसरा कि ये एक ऐसी भाषा है जिसका काम अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं को ठिकाने लगाने का है। इन पहरुओं ने ये काम शब्दकोश बनाने,प्रशासनिकों कामों में हिन्दी प्रयोग करने,दिशा-निर्देश जारी करने से लेकर अनुवाद करने तक में किया है। नतीजा ये हुआ कि जिस हिन्दी को सबसे सहज भाषा बननी चाहिए वो लोगों से दूर होती चली गयी और बाबुओं की भाषा बनकर रह गयी। इसका एक सिरा इस रुप में विकसित हुआ कि हिन्दी का ये रुप मजाक उड़ाने और इससे तौबा कर लेने के तौर पर स्थापित होता चला गया। टेलीविजन चैनलों पर ऐसी हिन्दी को लेकर वकायदा लॉफ्टर शो आने लगे हैं। दूसरा कि
निबटाने वाली भाषा के तौर पर शक्ल देने की वजह से ये आपसी मतभेदों को और अधिक उजागर करता रहा। इस बीच बोलचाल,बाजार,मनोरंजन,माध्यमों के बीच हिन्दी जिस रुप में विकसित होती रही उसे हिन्दी के सरकारी पहरुओं और आलोचकों ने सीरियसली नहीं लिया। वे सिर्फ हिन्दी के बीच से अंग्रेजी के शब्द बीन-बीनकर फेंकने में ही लगे रहे जबकि सवाल हिन्दी के बीच अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं के शब्दों का आना नहीं है,उन शब्दों के प्रयोग की स्वाभाविकता को लेकर है। अप्रतलित हिन्दी शब्दों का जबरिया इस्तेमाल और पॉपुलर हिन्दी शब्दों की जगह वेवजह अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग इसी राजनीति की शिकार हुई है। इसलिए.
जरुरी है कि हर साल हिन्दी दिवस के नाम पर सप्ताहभर पहले से मंत्रालयों औऱ तमाम सरकारी दफ्तरों के आगे उत्सवधर्मी रंगों के बैनर टांगने और अंदर जाकर मर्सिया पढ़ने का जो काम चला आ रहा है,उसकी प्रकृति पर बात हो। ये तय हो कि ये आयोजन हिन्दी के मर जाने पर आयोजित होती है,उसके जिंदा रखने की कोशिशों के लिए होती है,उसके विस्तार को दिशा देने के लिए होती है या फिर हिन्दी के चंद खुर्राट पेशेवर लिफाफादर्शी लोगों के थकाउ भाषणों में प्रसव की गुंजाईश आजमाने के लिए होती है? अगर ये हिन्दी के नाम का सिलेब्रेशन है तो माफ कीजिएगा इसकी शक्ल ऐसी बिल्कुल नहीं हो सकती जो हमें हिन्दी पखवाड़े में दिखाई देती है।.ये बहुत ही व्यक्तिगत स्तर पर अपने आप सिलेब्रेट करनेवाली चीज है या फिर बहुत हुआ तो छोटे-छोटे समूहों में कविता,कहानी,संस्मरणों के अंशों को पढ़कर और उनके शब्दों के बीच अर्थों में डूबकर...
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जिनके लिए हिन्दी बाजार के हाथों लगातार कुचली जाकर,पूंजीवाद के माध्यम से छली जाकर और अब इंटरनेट के दंगाइयों के संसर्ग में आकर अधमरी या पूरी तरह मर गयी है,उन्हें इसके विकास का राग अलपाने और जर्जर कोशिश करने के बजाय इसकी मौत की विधि-आयोजनों में शामिल हो जाना चाहिए। हिन्दी दिवस के नाम पर जबरदस्ती के उत्सवधर्मी रंगों के बैनर टांगकर अंदर सेमिनार हॉलों में टेसू बहाने से अच्छा है कि वे घर बैठकर सादगी से मातम मनाने का काम करें। कुछ नहीं तो कम से कम सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये तो बचेंगे। बाकी जिन्हें लगता है कि हिन्दी का लगातार विस्तार हो रहा है,वो ऐसी बातें सेमिनार और आयोजनों के बूते ऐसा नहीं कह रहे बल्कि वो अपने-अपने व्यक्तिगत स्तर पर ऐसा लगातार कर रहे हैं। हमारी अपील बस इतनी भर है कि जिन्हें हिन्दी मरती हुई नजर आती है,खासकर सालभर में केवल एक सप्ताह तक,जो पेशेवर तौर पर छाती पिटनेवाले लोग हैं,उन्हें इसे बेहतर करने के प्रयास आज से ही छोड़ देने चाहिए। वेवजह में हर साल उम्मीदों का पखाना छिरियाते हैं और अगले साल तक जिसकी बदबू अकादमियों में बजबजायी रहती है,जिसे ठोस रुप देने के लिए लाखों के खर्चे होते हैं।
कुछ साल तक हिन्दी जिस हाल में है,उसे उसी हाल में छोड़कर देखिए,व्यक्तिगत स्तर पर जो लोग जैसा कर रहे हैं केवल उन्हें ऐसा करने की छूट दे दें,फिर देखिए कि हिन्दी को चील-कौए खाते हैं या फिर हिन्दी सद्यस्नात: स्त्री( तुरंत नहाकर बाथरुम से निकली हुई) की तरह खिलकर हमारे सामने आती है।
मेरी अपनी समझ है कि हिन्दी की सेहत अव्वल तो पहले से बेहतर हुई है,पहले जो रघुवीर सहाय की दुहाजू बीबी हुआ करती थी,अब ज्यादा स्लीम ट्रीम हुई है। अब अगर ये अनमैरिड है तब तो सौन्दर्य के सैंकड़ों पैमाने उस पर अप्लाय कर दें लेकिन विवाहित भी है तो उसका रुप उन विवाहित स्त्रियों की तरह है जो रियलिटी शो के फैशन शो या डांस कॉम्पटीशन में शामिल होने के लिए कुलांचे भर रही है। जिस बाजार की हिन्दी समाज के अधिकांश आलोचक पानी पी-पीकर गरिआते हैं,उसी बाजार ने इसे एक प्रोफेशनल एटीट्यूड दिया है। अब वो अपने दम पर अपनी पेट भरने की हैसियत में आने लगी है। अब वो संस्थानों के पराश्रित नहीं है। आप चाहें तो हिन्दी की इस बदलती हालत पर स्त्री विमर्श के डॉमेस्टिक लेवर और मार्केट लेवर कॉमडिटी के तहत विश्लेषित कर हिन्दी की सेवाभावना को एक ठोस मनी वैल्यू निकाल सकते हैं। घरेलू हिंसा और सांस्थानिक जबरदस्ती से स्त्रियों के मुक्त होने की तरह ही आज की हिन्दी को समझ सकते हैं।
वर्चुअल स्पेस के जिन बलवाइयों से हिन्दी के गिद्ध-जड़ आलोचकों को खतरा है,उन वलवाइयों के पास इतनी तमीज तो जरुर है कि जिस हिन्दी के साथ वो खाते-पीते,डेटिंग करते हैं,उसे हमराज मानते हैं,उसकी लुक्स को फिट रखे। वर्चुअल स्पेस के वलवाईयों ने हिन्दी को इसी रुप में विस्तार दिया है जो कि ग्लोबल स्तर पर जाकर भी मैं हिन्दी हूं कहकर शान से अपना परिचय दे सकें। फिलहाल मैं इस बहस में बिल्कुल नहीं पड़ना चाहता कि ऐसा करते हुए इन लोगों ने वर्तनी,शिल्प,संरचना और शब्दों के स्तर पर कितना कबाड़ा किया है,सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि आज अगर हिन्दी दबी जुबान में बोलनेवाली भाषा एक हद तक नहीं रह गयी है( इसे ज्यादा मजबूती से कहना ज्यादती होगी) जिसकी क्रेडिट खुद हिन्दी के गिद्ध-सिद्ध आलोचक भी लेने में नहीं चूकते तो इसमें इनलोगों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संभव है कि इस स्पेस पर लिखनेवाले लोगों ने अज्ञेय की तरह प्रतीक और बिंब न गढ़े हों,मुक्तिबोध की तरह कोई सभ्यता-समीक्षा न प्रस्तावित की हो, निराला की तरह छंदों को नहीं साधा हो लेकिन मौजूदा परिवेश में उसने हिन्दी के भीतर जितनी कॉन्फीडेंस पैदा की है,उस पर गंभीरता से बात करने की जरुरत है। तो भी..
जिस किसी को हिन्दी भ्रष्ट होती हुई,छिजती हुई नजर आती है तो यकीन मानिए उसकी ये हालत सबसे ज्यादा उन्हीं लोगों के हाथों हुई है जिनके उपर इसे सेहतमंद रखने का जिम्मा डाला गया या फिर उन्होंने रोजी-रोटी के चक्कर में ये जिम्मेदारी अपने आप ले ली। अभी सप्ताह भर भी नहीं हुए कि राजभाषा समिति की रिपोर्ट अंग्रेजी में आने पर भारी हंगामा मचा। पिछले साल इस समिति से संबंद्ध पी.चिदमबरम के अंग्रेजी में भाषण दिए जाने पर छीछालेदर हुई। हिन्दी को बेहतर बनानेवाले पहरुओं ने इसे एक सहज भाषा के तौर पर विस्तार देने के बजाय इसे अपने कुचक्रों से एक अंतहीन समस्या के तौर पर तब्दील कर दिया। अगर किसी राजनीतिक विश्लेषक के आगे आतंकवाद,कश्मीर जैसी समस्याएं,तमाम प्रशासनिक सक्रियताओं के वावजूद एक अंतहीन समस्या जैसी जान पड़ती है तो भाषा पर बात करनेवालों के लिए हिन्दी की समस्या कुछ इसी तरह है। हिन्दी के पहरुओं ने इसका बंटाधार क्रमशः दो स्तरों पर किया है। एक तो ये कि उन्होंने एक जड़ समझ विकसित कर ली है कि हिन्दी का मतलब अधिक से अधिक तत्सम शब्दों का प्रयोग है.अंग्रेजी शब्दों का हिन्दी अनुवाद है और दूसरा कि ये एक ऐसी भाषा है जिसका काम अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं को ठिकाने लगाने का है। इन पहरुओं ने ये काम शब्दकोश बनाने,प्रशासनिकों कामों में हिन्दी प्रयोग करने,दिशा-निर्देश जारी करने से लेकर अनुवाद करने तक में किया है। नतीजा ये हुआ कि जिस हिन्दी को सबसे सहज भाषा बननी चाहिए वो लोगों से दूर होती चली गयी और बाबुओं की भाषा बनकर रह गयी। इसका एक सिरा इस रुप में विकसित हुआ कि हिन्दी का ये रुप मजाक उड़ाने और इससे तौबा कर लेने के तौर पर स्थापित होता चला गया। टेलीविजन चैनलों पर ऐसी हिन्दी को लेकर वकायदा लॉफ्टर शो आने लगे हैं। दूसरा कि
निबटाने वाली भाषा के तौर पर शक्ल देने की वजह से ये आपसी मतभेदों को और अधिक उजागर करता रहा। इस बीच बोलचाल,बाजार,मनोरंजन,माध्यमों के बीच हिन्दी जिस रुप में विकसित होती रही उसे हिन्दी के सरकारी पहरुओं और आलोचकों ने सीरियसली नहीं लिया। वे सिर्फ हिन्दी के बीच से अंग्रेजी के शब्द बीन-बीनकर फेंकने में ही लगे रहे जबकि सवाल हिन्दी के बीच अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं के शब्दों का आना नहीं है,उन शब्दों के प्रयोग की स्वाभाविकता को लेकर है। अप्रतलित हिन्दी शब्दों का जबरिया इस्तेमाल और पॉपुलर हिन्दी शब्दों की जगह वेवजह अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग इसी राजनीति की शिकार हुई है। इसलिए.
जरुरी है कि हर साल हिन्दी दिवस के नाम पर सप्ताहभर पहले से मंत्रालयों औऱ तमाम सरकारी दफ्तरों के आगे उत्सवधर्मी रंगों के बैनर टांगने और अंदर जाकर मर्सिया पढ़ने का जो काम चला आ रहा है,उसकी प्रकृति पर बात हो। ये तय हो कि ये आयोजन हिन्दी के मर जाने पर आयोजित होती है,उसके जिंदा रखने की कोशिशों के लिए होती है,उसके विस्तार को दिशा देने के लिए होती है या फिर हिन्दी के चंद खुर्राट पेशेवर लिफाफादर्शी लोगों के थकाउ भाषणों में प्रसव की गुंजाईश आजमाने के लिए होती है? अगर ये हिन्दी के नाम का सिलेब्रेशन है तो माफ कीजिएगा इसकी शक्ल ऐसी बिल्कुल नहीं हो सकती जो हमें हिन्दी पखवाड़े में दिखाई देती है।.ये बहुत ही व्यक्तिगत स्तर पर अपने आप सिलेब्रेट करनेवाली चीज है या फिर बहुत हुआ तो छोटे-छोटे समूहों में कविता,कहानी,संस्मरणों के अंशों को पढ़कर और उनके शब्दों के बीच अर्थों में डूबकर...
मां रोज के मुकाबले आज कुछ ज्यादा परेशान थी। बातचीत में साफ झलक रहा था कि उसकी दिल्ली में बाढ़ को लेकर चिंता( मुझे लेकर,वैसे सचिवालय,विधान सभा डूब जाए क्या मतलब) बढ़ती जा रही है। पिछले चार-पांच दिनों से वो रोज पूछती- सुन रहे हैं दिल्ली में बाढ़ आ गया है और फिर कुछ सवाल। पहले एक दिन मजाक में कहा भी.हियां( गरमी से परान जा रहा है,भेज दो कुछ पानी इधरे) लेकिन बाद में न्यूज चैनलों ने बाढ़ की खबरों का जो तंबू ताना कि वो मजाक करना भूलकर चिंतिंत होने लग गयी। आज तो हद ही हो गयी। जब उसने चैनल में मयूर विहार का भी नाम सुन लिया। उसे मेरे रहने का इलाका ठीक से पता नहीं था लेकिन हाल ही पता लिखाने के दौरान उसे याद हो आया था।
झूठ्ठा- और कोई नहीं मिला तो हमरे से झूठ बोल दिए कि सब ठीक है,हिआं टाटा स्काई पर दिखा रहा है कि जहां तुम रहते हो,हुआं(वहां ) भी बाढ़ आ गया है। तुमको बोले थे उ दिन कि इंडिया टीवी में सब देखा रहा है तो तुम बोले कि दू कौड़ी का चैनल है,मत देखा करो उसको,सब बकवास देखाता है। आज तो स्टार न्यूज भी यही सब देखा रहा है औ उ दाढ़ीवाला भी बोल रहा था कि आ गया है बाढ़। बता रहा था कि सब डूब गया,तब तो खाय-पिए में बड़ी दिक्कत हो जाता होगा बेटा,सर-समान ठीक से रखना। मैंने मजे लेने शुरु कर दिए,मां को हल्का करने के लिए। कहा- कौन दीपक चौरसिया,वही कह रहे थे? अच्छा ये बताओ कि जब सबकुछ डूब गया तो फिर उनको एकदम से टीवी स्क्रीन में हेकड़ी दिखाने के लिए गुटखा कहां से मिल गया,देख नहीं रही थी..कैसे भसर-भसर चिबा रहे थे। मां लगातार बोले जा रही थी..तुम हमको बहलाते हो,जरुर संकट में हो,आवाजे से लग रहा है,माय का करेजा तुम कैसे समझोगे,है तीन-चार साल। समझ में आ जाएगा कि कैसन होता है माय-बाप का बाल-बच्चा के लिए दर्द।
दिल्ली में बाढ़ को लेकर मां सहित तीन अलग-अलग शहरों में बसी दीदी से बात होती रही। सबके साथ वही परिहास। दिल्ली का पानी यहां भेज दो,बहुत गर्मी है। लेकिन आज सब थोड़े-थोड़े चिंतिंत। मां जितनी तो नहीं लेकिन मेरी बातों पर पूरी तरह भरोसा भी नहीं नहीं और बेफिक्र भी नहीं। मैंने सबों से यही कहा कि सबसे ज्यादा बाढ़ न्यूज चैनलों पर आया है। अगर मेरा बस चलता तो स्टोरी करता- फिल्म सिटी में हाहाकार,कौन है जिम्मेदार? डूब गया फलां चैनल का न्यूजरुम,छतरी लगाकर कर रहे हैं एंकरिंग। लेकिन क्या करें? सबों की एक ही लाइन,फिर भी- तुम सब बात हंसी में टाल देते हो,ध्यान रखना। आज तो सीरियसली सबने दिखाया है।
ये कहानी सिर्फ मेरी और मेरे घर के लोगों की चिंता को लेकर नहीं है। संभव है मेरी तरह अकेले दिल्ली में रहनेवाले लोगों के घर से भी लगातार फोन आ रहे होंगे,घर के लोग परेशान होंगे। वो बिहार-झारखंड,यूपी देश के दूरदराज इलाके में बैठकर न्यूज चैनल्स देख रहे हैं,उन्हें कैसे समझाया जाए कि दिल्ली में बाढ़ से ज्यादा चैनलों में एडीटिंग मशीन की संतानों की कारस्तानी है। वो अपनी पीटूसी पर लट्टू हुए जा रहे होंगे और यहां है कि लाखों-हजारों परिवार के लोगों की जान अटकी हुई होगी। उन्हें इन सबसे क्या मतलब? वो एक टीवी कर्मचारी होने के अलावे किसी का बेटा,किसी के भाई,किसी के पति,किसी के देवर थोड़े ही है? उनके पीछे उन्हें याद करनेवाला,रोनेवाला थोड़े ही है?..और अगर है भी तो देख ही रहे होंगे कि मेरा बेटा कैसे शान से केसरिया रंग का डूबने से बचनेवाला जैकिट पहनकर हीरोगिरी कर रहा है,वोट में बैठकर सैर कर रहा है और जो कुछ भी कविता-कहानी बांच रहा है उसको लाखों लोग आंख गड़ाकर सुन-देख रहे होंगे? इंडिया टीवी की क्या कहें- बाढ़ वाली दिल्ली की दस कहानियां। इस चैनल को दस का अंक लगाने की ऐसी लत लगी है कि लगता है दाती महाराज ने सलाह दी है,हर बात में दस..दस चुलबुल पांडे तक।.हद है।.
ऐसी स्थिति में हम और बाकी लोग अपने घर के लोगों को टेलीविजन की उन बारीकियों को नहीं समझा सकते,जहां पर वो निरा चिरकुटई का काम करते हैं। शाम को स्टार न्यूज जिसने कि बाढ़ की खबरों को लेकर सबसे ज्यादा तंबू खड़ा किए हुए है,उसके दर्जनभर संवाददाता इसी काम में लगे हुए हैं कि वो दिल्ली के कुछ इलाकों में घुस आए पानी को कोसी के कहर से भी बड़ा दिखाएं-बताएं-उनकी बेशर्मी चरम पर है। एक संवाददाता प्रफुल्ल श्रीवास्तव तो भी- मोटर लगी नाव में खड़ा है-चारो तरफ पानी है। जाहिर है ये इलाके के भीतर का पानी नहीं है-वहीं से खड़े होकर चारों तरफ के उन इलाकों को डूबा हुआ बता रहा है जहां कि सड़के सूखी है। वो प्रोपर्टी डीलर की तरह हाथें फैलाता है-ये देखिए,इधर डूबा,वो देखिए सब डूबा।.वो जहां खड़ा है वहां की पूरी चौहद्दी को डूबा करार दे रहा है। जब शहर को डूबा हुआ ही दिखाना है तो लोकेशन वाइज मैंदान में उतरकर बात करो न। तुम पेड़ की तरफ इशारा किए और कह दिया-ये रहा निगम बोधघाट और हम मान लें।.. गदहे हैं क्या? उसी चैनल का संवाददाता वही काम कर रहा है जबकि फुटेज में चैनल की ओबी दिख रही है जिसके टायर तक डूबे नहीं है। लोकेशन को लेकर चैनल जो घपलेबाजी कर रहा है,वो आम ऑडिएंस के बीच आतंक से कम दहशत पैदा नहीं कर रहा। मयूर विहार में पानी,डूब गया।..तो भाई कौन सा इलाका,माचिस की डिबिया है क्या मयूर विहार? प्रोपर्टी के लिए इंच-इंच की मारकाट मची होती है और आप हो कि राउंड फीगर में सब बता रहे हो। हमें ये बात समझ आ रही है कि ये चैनल ऐसा क्यों कर रहा है?
आजतक ने कल से जो ऑपरेशन हे राम जिसमें आशाराम बापू से लेकर दाती महाराज,सुधांशु महाराज, महाकाल सब लपेटे में आ गए हैं,उससे चैनल को अच्छी टीआरपी मिलनी लगभग तय है। इधर इंडिया टीवी ने लीग मैच पूरी लाइव दिखायी थी और एंकर ने हिन्दी में कमेंटरी कर दी,ये न्यूज चैनल पर क्रिकेट को पेश करने का नया तरीका था,अब इस चैनल के पास भी अच्छी टीआरपी आनी चाहिए। अब स्टार के पास क्या बचता तो बस खेल गए दिल्ली में बाढ़ और पल-पल की खबर पर। अश्लील तो तब लगा जब संवाददाता ने कहा कि आज दोपहर तक कॉमनवेल्थ के फ्लैट्स जहां बने हैं दोपहर तक पानी नहीं था और जब प्रत्यक्षदर्शी से बोलने कहा तो उसने बताया कि सुबह चार बजे ही पानी घुस आया था। फील्ड में अपने को चमकाने की बेहूदा हरकतें लाखों ऑडिएंस के जीवन को किस तरह प्रभावित करती है,इसका कोई अंदाजा इन्हें नहीं है। खबरों के पीछे का समाजशास्त्रीय विश्लेषण पूरी तरह मर गया,उसका गला घोंट दिया गया है। टीआरपी आ जाने की स्थिति में वो ठहाके लगाएंगे- अच्छा खेल गए हम इस बाढ़ पर। संभव है अबकी बार फिर बाढ़ की स्टोरी पर किसी को पॉलिटिकल कैटेगरी में गोयनका अवार्ड मिल जाए। लेकिन, जिस अंदाज में वो दिल्ली में बाढ़ की खबरें दिखा रहे हैं वो खबरें देने का काम कम,डराने का काम ज्यादा कर रहे हैं। उनके लिए बाढ़ का आना उत्सव है, पानी का उतरना मातम। लेकिन शायद वो ये नहीं समझ पा रहे हैं कि इस अफरा-तफरी में लोगों से टीवी देखना ही छूट गया तो टीआरपी के बदले क्या आएगा- घंटा?
मां को कई तरह से आश्वस्त किया। इतना तक कहा कि जब बाढ़ से ही डूबकर मरना है तो बिहार-झारखंड ही ठीक है न। घर छोड़कर इतनी दूर आए हैं,दिल्ली में कुछ करने आए हैं,कुछ और नहीं तो बाढ़ में डूबकर मरेंगे क्या? मां तुम टेंशन मत लो और हां एक काम करो,मैं तुम्हें सास-बहू सीरियलों के अलावे कुछ इधर-उधर मतलब न्यूज चैनलों को भी देखने की जो राय देता रहा,उसे भूल जाओ। तुम सास-बहू ही देखती रहो। हम तुमसे इसी पर बात करेंगे कि लाडो की सिया कैसे धीरज को बचा पाएगी, उतरन की तपस्या फिर किसके जाल में फंसेगी,गीत का सपना पूरा होगा भी या नहीं, ललिया की यादाश्त वापस आएगी कि नहीं? मां,अगली बार फोन पर यही सब बात करुंगा,एपीसोड देखकर तैयार रहना..
नोट- चैनलों की इस गंध मचाने,बाढ़ के नाम पर रायता फैलाने की तरफ वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने भी फेसबुक पर नोटिस ली है- दिल्ली के एक हिस्से में यमुना बहती है। उसके आसपास रहने वाले कुछ इलाकों में पानी भर गया है। इनसाइट फाउंडेशन के मित्र अनूप कुमार ने अपनी मां को मैसेज भेजा है कि ज्यादा परेशान न हों और हो सके तो न्यूज चैनल कम देखें। दिल्ली का राष्ट्रीय मीडिया दिल्ली-मुंबई को लेकर जिस तरह पगलाया हुआ है, वह उसके राष्ट्रीय होने पर सवालिया निशान खड़ा करता है। कोशी की बाढ़ में 15000 लोगों के मरने से बड़ी है यमुना की बाढ़! शर्म...शर्म।
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झूठ्ठा- और कोई नहीं मिला तो हमरे से झूठ बोल दिए कि सब ठीक है,हिआं टाटा स्काई पर दिखा रहा है कि जहां तुम रहते हो,हुआं(वहां ) भी बाढ़ आ गया है। तुमको बोले थे उ दिन कि इंडिया टीवी में सब देखा रहा है तो तुम बोले कि दू कौड़ी का चैनल है,मत देखा करो उसको,सब बकवास देखाता है। आज तो स्टार न्यूज भी यही सब देखा रहा है औ उ दाढ़ीवाला भी बोल रहा था कि आ गया है बाढ़। बता रहा था कि सब डूब गया,तब तो खाय-पिए में बड़ी दिक्कत हो जाता होगा बेटा,सर-समान ठीक से रखना। मैंने मजे लेने शुरु कर दिए,मां को हल्का करने के लिए। कहा- कौन दीपक चौरसिया,वही कह रहे थे? अच्छा ये बताओ कि जब सबकुछ डूब गया तो फिर उनको एकदम से टीवी स्क्रीन में हेकड़ी दिखाने के लिए गुटखा कहां से मिल गया,देख नहीं रही थी..कैसे भसर-भसर चिबा रहे थे। मां लगातार बोले जा रही थी..तुम हमको बहलाते हो,जरुर संकट में हो,आवाजे से लग रहा है,माय का करेजा तुम कैसे समझोगे,है तीन-चार साल। समझ में आ जाएगा कि कैसन होता है माय-बाप का बाल-बच्चा के लिए दर्द।
दिल्ली में बाढ़ को लेकर मां सहित तीन अलग-अलग शहरों में बसी दीदी से बात होती रही। सबके साथ वही परिहास। दिल्ली का पानी यहां भेज दो,बहुत गर्मी है। लेकिन आज सब थोड़े-थोड़े चिंतिंत। मां जितनी तो नहीं लेकिन मेरी बातों पर पूरी तरह भरोसा भी नहीं नहीं और बेफिक्र भी नहीं। मैंने सबों से यही कहा कि सबसे ज्यादा बाढ़ न्यूज चैनलों पर आया है। अगर मेरा बस चलता तो स्टोरी करता- फिल्म सिटी में हाहाकार,कौन है जिम्मेदार? डूब गया फलां चैनल का न्यूजरुम,छतरी लगाकर कर रहे हैं एंकरिंग। लेकिन क्या करें? सबों की एक ही लाइन,फिर भी- तुम सब बात हंसी में टाल देते हो,ध्यान रखना। आज तो सीरियसली सबने दिखाया है।
ये कहानी सिर्फ मेरी और मेरे घर के लोगों की चिंता को लेकर नहीं है। संभव है मेरी तरह अकेले दिल्ली में रहनेवाले लोगों के घर से भी लगातार फोन आ रहे होंगे,घर के लोग परेशान होंगे। वो बिहार-झारखंड,यूपी देश के दूरदराज इलाके में बैठकर न्यूज चैनल्स देख रहे हैं,उन्हें कैसे समझाया जाए कि दिल्ली में बाढ़ से ज्यादा चैनलों में एडीटिंग मशीन की संतानों की कारस्तानी है। वो अपनी पीटूसी पर लट्टू हुए जा रहे होंगे और यहां है कि लाखों-हजारों परिवार के लोगों की जान अटकी हुई होगी। उन्हें इन सबसे क्या मतलब? वो एक टीवी कर्मचारी होने के अलावे किसी का बेटा,किसी के भाई,किसी के पति,किसी के देवर थोड़े ही है? उनके पीछे उन्हें याद करनेवाला,रोनेवाला थोड़े ही है?..और अगर है भी तो देख ही रहे होंगे कि मेरा बेटा कैसे शान से केसरिया रंग का डूबने से बचनेवाला जैकिट पहनकर हीरोगिरी कर रहा है,वोट में बैठकर सैर कर रहा है और जो कुछ भी कविता-कहानी बांच रहा है उसको लाखों लोग आंख गड़ाकर सुन-देख रहे होंगे? इंडिया टीवी की क्या कहें- बाढ़ वाली दिल्ली की दस कहानियां। इस चैनल को दस का अंक लगाने की ऐसी लत लगी है कि लगता है दाती महाराज ने सलाह दी है,हर बात में दस..दस चुलबुल पांडे तक।.हद है।.
ऐसी स्थिति में हम और बाकी लोग अपने घर के लोगों को टेलीविजन की उन बारीकियों को नहीं समझा सकते,जहां पर वो निरा चिरकुटई का काम करते हैं। शाम को स्टार न्यूज जिसने कि बाढ़ की खबरों को लेकर सबसे ज्यादा तंबू खड़ा किए हुए है,उसके दर्जनभर संवाददाता इसी काम में लगे हुए हैं कि वो दिल्ली के कुछ इलाकों में घुस आए पानी को कोसी के कहर से भी बड़ा दिखाएं-बताएं-उनकी बेशर्मी चरम पर है। एक संवाददाता प्रफुल्ल श्रीवास्तव तो भी- मोटर लगी नाव में खड़ा है-चारो तरफ पानी है। जाहिर है ये इलाके के भीतर का पानी नहीं है-वहीं से खड़े होकर चारों तरफ के उन इलाकों को डूबा हुआ बता रहा है जहां कि सड़के सूखी है। वो प्रोपर्टी डीलर की तरह हाथें फैलाता है-ये देखिए,इधर डूबा,वो देखिए सब डूबा।.वो जहां खड़ा है वहां की पूरी चौहद्दी को डूबा करार दे रहा है। जब शहर को डूबा हुआ ही दिखाना है तो लोकेशन वाइज मैंदान में उतरकर बात करो न। तुम पेड़ की तरफ इशारा किए और कह दिया-ये रहा निगम बोधघाट और हम मान लें।.. गदहे हैं क्या? उसी चैनल का संवाददाता वही काम कर रहा है जबकि फुटेज में चैनल की ओबी दिख रही है जिसके टायर तक डूबे नहीं है। लोकेशन को लेकर चैनल जो घपलेबाजी कर रहा है,वो आम ऑडिएंस के बीच आतंक से कम दहशत पैदा नहीं कर रहा। मयूर विहार में पानी,डूब गया।..तो भाई कौन सा इलाका,माचिस की डिबिया है क्या मयूर विहार? प्रोपर्टी के लिए इंच-इंच की मारकाट मची होती है और आप हो कि राउंड फीगर में सब बता रहे हो। हमें ये बात समझ आ रही है कि ये चैनल ऐसा क्यों कर रहा है?
आजतक ने कल से जो ऑपरेशन हे राम जिसमें आशाराम बापू से लेकर दाती महाराज,सुधांशु महाराज, महाकाल सब लपेटे में आ गए हैं,उससे चैनल को अच्छी टीआरपी मिलनी लगभग तय है। इधर इंडिया टीवी ने लीग मैच पूरी लाइव दिखायी थी और एंकर ने हिन्दी में कमेंटरी कर दी,ये न्यूज चैनल पर क्रिकेट को पेश करने का नया तरीका था,अब इस चैनल के पास भी अच्छी टीआरपी आनी चाहिए। अब स्टार के पास क्या बचता तो बस खेल गए दिल्ली में बाढ़ और पल-पल की खबर पर। अश्लील तो तब लगा जब संवाददाता ने कहा कि आज दोपहर तक कॉमनवेल्थ के फ्लैट्स जहां बने हैं दोपहर तक पानी नहीं था और जब प्रत्यक्षदर्शी से बोलने कहा तो उसने बताया कि सुबह चार बजे ही पानी घुस आया था। फील्ड में अपने को चमकाने की बेहूदा हरकतें लाखों ऑडिएंस के जीवन को किस तरह प्रभावित करती है,इसका कोई अंदाजा इन्हें नहीं है। खबरों के पीछे का समाजशास्त्रीय विश्लेषण पूरी तरह मर गया,उसका गला घोंट दिया गया है। टीआरपी आ जाने की स्थिति में वो ठहाके लगाएंगे- अच्छा खेल गए हम इस बाढ़ पर। संभव है अबकी बार फिर बाढ़ की स्टोरी पर किसी को पॉलिटिकल कैटेगरी में गोयनका अवार्ड मिल जाए। लेकिन, जिस अंदाज में वो दिल्ली में बाढ़ की खबरें दिखा रहे हैं वो खबरें देने का काम कम,डराने का काम ज्यादा कर रहे हैं। उनके लिए बाढ़ का आना उत्सव है, पानी का उतरना मातम। लेकिन शायद वो ये नहीं समझ पा रहे हैं कि इस अफरा-तफरी में लोगों से टीवी देखना ही छूट गया तो टीआरपी के बदले क्या आएगा- घंटा?
मां को कई तरह से आश्वस्त किया। इतना तक कहा कि जब बाढ़ से ही डूबकर मरना है तो बिहार-झारखंड ही ठीक है न। घर छोड़कर इतनी दूर आए हैं,दिल्ली में कुछ करने आए हैं,कुछ और नहीं तो बाढ़ में डूबकर मरेंगे क्या? मां तुम टेंशन मत लो और हां एक काम करो,मैं तुम्हें सास-बहू सीरियलों के अलावे कुछ इधर-उधर मतलब न्यूज चैनलों को भी देखने की जो राय देता रहा,उसे भूल जाओ। तुम सास-बहू ही देखती रहो। हम तुमसे इसी पर बात करेंगे कि लाडो की सिया कैसे धीरज को बचा पाएगी, उतरन की तपस्या फिर किसके जाल में फंसेगी,गीत का सपना पूरा होगा भी या नहीं, ललिया की यादाश्त वापस आएगी कि नहीं? मां,अगली बार फोन पर यही सब बात करुंगा,एपीसोड देखकर तैयार रहना..
नोट- चैनलों की इस गंध मचाने,बाढ़ के नाम पर रायता फैलाने की तरफ वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने भी फेसबुक पर नोटिस ली है- दिल्ली के एक हिस्से में यमुना बहती है। उसके आसपास रहने वाले कुछ इलाकों में पानी भर गया है। इनसाइट फाउंडेशन के मित्र अनूप कुमार ने अपनी मां को मैसेज भेजा है कि ज्यादा परेशान न हों और हो सके तो न्यूज चैनल कम देखें। दिल्ली का राष्ट्रीय मीडिया दिल्ली-मुंबई को लेकर जिस तरह पगलाया हुआ है, वह उसके राष्ट्रीय होने पर सवालिया निशान खड़ा करता है। कोशी की बाढ़ में 15000 लोगों के मरने से बड़ी है यमुना की बाढ़! शर्म...शर्म।
सबलोग पत्रिका ने अगस्त-सितंबर के अंक का बड़ा हिस्सा मीडिया को दिया है जिसमें दर्जन भर से ज्यादा लेख मीडिया के अलग-अलग संदर्भों को लेकर है। आज मीडिया पर लिखने के लिए मुद्दों की कमी नहीं है लेकिन जो सबसे जरुरी मुद्दा मुझे समझ आता है वो ये कि वर्चुअल स्पेस पर मीडिया को जिस तरीके से देखा-समझा जा रहा है,उस पर बात शुरु की जाए। लिहाजा इसी नीयत से मैंने ये लेख पत्रिका के लिए भेजी। प्रकाशित होने के बाद अब आपके सामने-
न्यूज चैनलों पर हमला होते ही टेलीविजन पर बात करने का हमारा नजरिया एकदम से बदल जाता है। हम सालभर तक जिन चैनलों की आलोचना सरोकारों से कटकर भूत-प्रेत, पाखंड, सांप-सपेरे और मनोरंजन चैनलों की फुटेज काटकर घंटों चलाते रहने के कारण करते हैं, उन्हीं चैनलों पर जब कभी भी हमले होते हैं, हम एकदम से उनके साथ खड़े हो लेते हैं। चैनलों की ओर से अपने उपर हुए हमले को लेकर जो भी खबरें और पैकेज दिखाये-बताये जाते हैं, उसे लेकर हमारे बीच कई स्तरों पर असहमति होती हैं। वे जो इसे सीधे तौर पर लोकतंत्र पर हमला,कुचलने की कोशिश बताते हैं, हम इसे जनमाध्यमों के बीच पनप रहा पाखंड मानते हैं। लेकिन यहां हम माध्यमों के चारित्रिक विश्लेषण में फंसने के बजाय सीधे तौर पर चैनल का समर्थन करते हैं। इससे अलग प्रिंट माध्यमों में मीडिया पर हमले को लेकर बहुत ही कम देखने-पढ़ने को मिल पाता है।
मेनस्ट्रीम मीडिया से अलग वर्चुअल स्पेस पर मीडिया और टेलीविजन को लेकर अपनी बात रखनेवाले हम जैसे लोगों की कोशिश होती है कि हमले की बात जल्द से जल्द और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे। हम इस बात पर यकीन रखते हैं कि हमारा काम गहरे विश्लेषण से पहले वर्चुअल स्पेस पर हिन्दी और मीडिया के ज्यादा से ज्यादा पन्नों और लिंक पैदा करना है जिससे कि तमाम दूसरे माध्यमों से जुड़े लोग सर्च इंजन में चैनल के नाम के साथ अटैक या हमला लिखें तो उन्हें कई लिंक मिलने लग जाएं।
16 जुलाई शाम के करीब पांच बजे आरएसएस के हजारों कार्यकर्ताओं ने आजतक न्यूज चैनल के दिल्ली ऑफिस करोलबाग पर हमला कर दिया,वहां जमकर तोड़-फोड़ मचायी और कॉफी हाउस को बुरी तरह तहस-नहस कर दिया। तब इंटरनेट पर हमले को लेकर कोई खबर नहीं थी। चैनल की ऑफिशियल साइट पर चार-पांच लाइनों से ज्यादा कुछ नहीं। हम बज्ज, फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग पर लगातार सक्रिय हो जाते हैं। इस खबर को लेकर कई लिंक पैदा करना चाहते हैं। ऐसा करते हुए हमें सबसे ज्यादा जरुरी लगता है कि हमले की वीडियो फुटेज दुनियाभर के लोगों के बीच जानी चाहिए और तब टेलीविजन से रिकार्ड करके एक-एक फुटेज यूट्यूब पर अपलोड करते चले जाते हैं। दो घंटे के भीतर यूट्यूब की इस लिंक पर साठ से ज्यादा विजिट होते हैं। उस समय से लेकर सुबह तक ब्लॉग पर दर्जनों कमेंट आ जाते हैं और ब्लॉग पर लिखी पोस्ट दूसरी साइटों पर साभार के साथ लग जाती है। बाकी जगहों पर भी रिस्पांस मिलने शुरु हो जाते हैं और इस तरह “तात्कालिक पक्षधरता” का यह काम,चैनल की संस्कृति और उसके भीतर लोकतंत्र के चरित्र के विश्लेषण से बहुत पहले हो चुका होता है।
हम हमले का विरोध करते हुए किसी न किसी रुप में न केवल चैनल के पक्ष में माहौल बनाने का काम करने लग जाते हैं, बल्कि जो काम चैनल के लोग मोटी तनख्वाह लेकर करते हैं,उसे हम अपने-अपने घुप्प अंधेरे कमरों में बैठकर करते हैं। यह बिल्कुल ही नए किस्म का टेलीविजन विमर्श है जिसकी आलोचना करते हुए भी उसका विस्तार देने का काम हजारों वेब लेखक लगातार कर रहे हैं। दूसरी तरफ प्रिंट माध्यमों में टेलीविजन पर जो कुछ भी लिखा जाता है उनमें से अधिकांश को पढ़ते हुए साफ तौर पर लगता है कि यह गैरजरुरी माध्यम है, भ्रष्ट है और इस पर लिखा ही इसलिए जा रहा है कि लिख-लिखकर इसे नेस्तनाबूद् कर देना है। इस नजरिए के साथ टेलीविजन और मीडिया पर लिखने का ही नतीजा है कि कार्यक्रमों की प्रकृति,दिखाए जाने के तरीके और तेजी से बदलती तकनीक और विस्तार के वाबजूद विश्लेषण के तरीके में बहुत फर्क नहीं आया है। पूरे टेलीविजन विश्लेषण में दो तरह की ही सैद्धांतिकी या अवधारणा काम करती है। एक जो कि बिल्बर श्रैम ने विकासशील देशों के लिए माध्यम का काम अनिवार्य रुप से सामाजिक विकास की गति में सहयोग करना है और दूसरा मार्क्सवादी समीक्षा जिसके अनुसार टेलीविजन एक पूंजीवादी माध्यम है इसलिए ये सरोकार और जनपक्षधरता की बात नहीं कर सकता। टेलीविजन को लेकर यह समझ पैदा करने में शुरुआती दौर में अडोर्नों, अल्थूसर,रेमंड विलियम्स,मार्शल मैक्लूहान और जॉन फिस्के जैसे मीडिया और संस्कृति आलोचकों से मदद मिली तो बाद में इलिहू कर्ट्ज,मैनचेस्नी और संस्कृति के मामले में एक हद तक फीदेल कास्त्रों के लेखन के आधार पर सैद्धांतिकियां विकसित की गयी। खासकर हिन्दी में टेलीविजन और मीडिया विश्लेषण की बात करें तो यही आधार के तौर पर स्थापित हैं। यह अलग बात है कि इनमें से कई सिद्धांत सीधे-सीधे मीडिया से नहीं जुड़ते हैं जबकि मीडिया समीक्षा के दौरान मीडिया,संस्कृति और समाज सबों को एक ही मान लिया जाता है। इन सैद्धांतिकियों का प्रयोग खासतौर पर निजी चैनलों की आलोचना के लिए की जाती है। इसके साथ ही बिल्बर श्रैम ने जो सिद्धांत बताए,जिसका बड़ा हिस्सा यूनेस्को और बाद में प्रसार भारती ने अपनाया,उसके तहत पूरी मीडिया संस्कृति को देखने-समझने का काम किया जाता रहा है। सच्चाई है कि इन सारे सिद्धांतों में पहले के मुकाबले बहुत अधिक विकास हुआ है,इसकी बुनियादी मान्यताओं के नए संस्करण बने हैं। पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग के मामले में तो फिर भी ये विकासवादी सिद्धांत एक हद तक काम में आ सकते हैं लेकिन कॉर्पोरेट मीडिया को इन सिद्धांतों के जरिए विश्लेषित कर पाना असंभव है। हिन्दी में मीडिया विश्लेषण सिद्धांतों के इन पुराने संस्करण से बाहर नहीं निकल पाया है।
वर्चुअल स्पेस में खासकर हिन्दी में मीडिया और टेलीविजन को लेकर विमर्श अपने शुरुआती दौर में है। अभी तक जो भी और जितना भी लिखा गया है उस आधार पर किसी भी तरह के बड़े दावे करना बेमानी होगी। हम अभी यह कहने की स्थिति में नहीं है कि इसने किसी तरह की नई मीडिया सैद्धांतिकियों को गढ़ लिया है और यह भी नई कह सकते है कि यह अब तक की विश्लेषण पद्धतियों को शिकस्त देने की रणनीति बना चुके हैं। लेकिन इतना जरुर है कि वर्चुअल स्पेस पर मीडिया लेखन का जो दौर शुरु हुआ है उसमें विश्लेषण की बारीकियों के चिन्ह साफ तौर पर दिखाई देते हैं।
प्रिंट माध्यम का लेखन जहां टेलीविजन के सारे कार्यक्रमों को मिलाकर जहां एक गोल-मोल समझ पैदा करने की प्रक्रिया में होता है वहीं वर्चुअल स्पेस पर एक-एक कार्यक्रम को लेकर विश्लेषण पद्धति खोजने और गढ़ने की प्रक्रिया जारी है। दिलचस्प है कि साहित्य,सिनेमा,कला आदि की दुनिया में किसी एक शख्सियत और उनके काम को लेकर लिखने की लंबी परंपरा रही है लेकिन टेलीविजन विमर्श में यह नदारद है। किसी एक प्रोड्यूसर, कैमरामैन,रिपोर्टर का व्यक्तिगत स्तर पर कोई जिक्र नहीं। रियलिटी शो पर बात करते हुए वही फार्मूले चिपकाए जाते हैं जिसके तहत हम टीवी सीरियलों की बात करते हैं,न्यूज चैनल की प्रकृति मनोरंजन चैनलों की प्रकृति से बिल्कुल अलग होनी चाहिए लेकिन सबकुछ कुछ जार्गन और शब्दों के बीच फंसा हुआ है। इसके साथ ही एक-एक खबर को लेकर चैनलों का क्या रवैया रहा,उसके लिए किस तरह के मोंटाज,सुपर,हेडर लगाए गए,इन सबकी चर्चा बारीकी से होनी चाहिए। वर्चुअल स्पेस में प्रोडक्शन की पूरी प्रक्रिया के बीच में रखकर टेलीविजन और उसके कार्यक्रमों को देखने की कोशिश विश्लेषण की एक नयी समझ पैदा करती है।
ऐसा होने से टेलीविजन और मीडिया को लेकर विमर्श का जो दायरा कंटेंट से शुरु होकर कंटेंट पर जाकर ही खत्म हो जाया करते, आलोचना का अर्थ पूरी तरह प्रभावों की चर्चा तक जाकर सिमट जाती है,यहां तकनीक और रिवन्यू के बीच फंसी मीडिया को देखने-समझने की कोशिशें तेजी हुई है। यहां चुनौती इस बात को लेकर नहीं है कि मीडिया की जो सैद्धांतिकियां पहले से स्थापित है,उसके खांचे में रखकर विश्लेषण का काम कैसे किया जाए बल्कि चुनौती इस बात को लेकर है कि मीडिया की कार्य-संस्कृति और उसकी शर्तों को समझते हुए( जिसमें की तकनीक से लेकर अर्थशास्त्र के मसले शामिल हैं) उसके भीतर की संभावनाओं को कैसे बचाया जा सके,विस्तार दिया जा सके। ऐसे में आज यदि हम वर्चुअल स्पेस पर विमर्श के इन तरीकों को मजबूती दे रहे हैं तो यह बहुत हद तक संभव है कि एक बड़ा सवाल पैदा हो कि ऐसा करते हुए भी हम चैनल की जड़ों को मजबूत कर रहे हैं,उनके पक्ष को ही मजबूती दे रहे हैं और इस तरह किसी न किसी तरह से बाजार,पूंजीवाद औऱ कार्पोरेट ताकतों से लैस मीडिया के साथ खड़े हैं। लेकिन इसके साथ ही एक सवाल यह भी है कि प्रिंट माध्यमों की टेलीविजन समीक्षा कितनी व्यावहारिक और विश्वसनीय है? यह सवाल इसलिए भी जरुरी है कि आलोचना का अर्थ किसी विधा को विकसित करते रहना भर नहीं है बल्कि जिस विधा या क्षेत्र को लेकर आलोचना की जा रही है उस पर असर भी पैदा करना है। ऐसे में वर्चुअल स्पेस पर हो रहे टेलीविजन और मीडिया विमर्श के बीच से व्यावहारिक समीक्षा के सूत्र खोजे जा सकते हैं,इस पर भी बात होनी चाहिए।
आजतक पर टीआरपी की चाबुक लगातार चल रही है और वो पछाड़ खाकर गिर रहा है। जिस टीआरपी के बक्से ने उसे मीडिया इन्डस्ट्री का बेताज बादशाह बनाया,पिछले कुछ हफ्तों से वही उसकी चमड़ी उधेड़कर रख दिया है। पहले से ही लहूलूहान हुए इस चैनल पर इन्डस्ट्री के अनुभवी पत्रकार नागार्जुन(बदलता हुआ नाम) मरहम-पट्टी करने के बजाय उनके जख्मों को और हरा कर दिया। उन तमाम मसलों पर बेबाकी से बात की जिसकी वजह से आजतक की ये हालत हुई है। नागार्जुन की नींबू निचोड़ शैली में अपनी बात रखने के बाद कहने को कुछ रह नहीं जाता लेकिन जो मसला हमें जरुरी लगा उसे मैंने आज मोहल्लालाइव पर शेयर किया। वो कमेंट और पोस्ट की शक्ल में मौजूद है। लिहाजा ये पोस्ट आपसे साझा कर रहा हूं-
डिस्ट्रीब्यूशन के सवाल पर हमें जो जानकारी मिली उसके अनुसार हमसे ही सवाल किया गया – आनेवाले पंद्रह दिन आजतक के साथ ऐसा ही रहेगा, पता है क्यों? मैंने कहा – नहीं, मुझे नहीं पता। विश्लेषण के आधार पर जो अटकलें लगा सकता था, उसे मैंने सामने नहीं रखा था। उनका जबाब था – डिस्ट्रीब्यूशन। आजतक ने अपना डिस्ट्रीब्यूशन दिल्ली सहित दूसरे शहरों में कम करके साउथ की तरफ इसे बढ़ाया है और बढ़ाने जा रहे हैं। आनेवाले समय में वो कुछ और चैनल उधर लांच करेंगे।
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डिस्ट्रीब्यूशन के सवाल पर हमें जो जानकारी मिली उसके अनुसार हमसे ही सवाल किया गया – आनेवाले पंद्रह दिन आजतक के साथ ऐसा ही रहेगा, पता है क्यों? मैंने कहा – नहीं, मुझे नहीं पता। विश्लेषण के आधार पर जो अटकलें लगा सकता था, उसे मैंने सामने नहीं रखा था। उनका जबाब था – डिस्ट्रीब्यूशन। आजतक ने अपना डिस्ट्रीब्यूशन दिल्ली सहित दूसरे शहरों में कम करके साउथ की तरफ इसे बढ़ाया है और बढ़ाने जा रहे हैं। आनेवाले समय में वो कुछ और चैनल उधर लांच करेंगे।
उनके हिसाब से आजतक की जो हालत हुई है, वो जान-बूझकर हुई है और आजतक के लोग भी इसे जानते हैं। ये तो बाहर के लोग बेवजह हो-हल्ला मचा रहे हैं। लेकिन किसी के लिए भी ये बात समझ से परे है कि कोई भी चैनल जमी-जमायी रिच को उखाड़कर दूसरी जगह डिस्ट्रीब्यूशन पर ध्यान जमाएगा। टीआरपी की शर्त पर दूसरे नये वेंचर नहीं खड़े किये जा सकते। ये इनहाउस संतोष कर लेने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है लेकिन आजतक की गिरती हालत को डिस्ट्रीब्यूशन की बहानेबाजी के तहत नहीं धकेला जा सकता है। हां, ये जरूर है कि अगर आजतक आनेवाले समय में मामूली रिसोर्सेज बढ़ाते हुए (जिसमें ट्रांस्पॉन्डर स्पेस भी शामिल हैं) नये वेंचर खड़ा करने की कोशिश करता है, तो परेशानी हो सकती है।
इसी क्रम में जो एक सवाल जो कि संभव है, थोड़ा सब्जेक्टिव हो वो ये कि अब आजतक के लोगों के बीच काम करने का उत्साह पहले जैसा नहीं रह गया है। उन्हें अब महसूस नहीं होता कि वो देश के सबसे बेहतर चैनल, सबसे तेज चैनल और नियम-कायदे से चलनेवाले चैनल में काम कर रहे हैं। नंबर वन बनाये रखने का जज्बा उनके भीतर से लगातार मर रहा है, जिसकी एक वजह तो ये कि इसे लीड करनेवाले लोग उन्हें अपने फैसले से जोश में बनाये रखने की स्थिति में नहीं हैं और दूसरी वजह जो कि ज्यादा ठोस हो सकती है – चार साल से कोई इनक्रीमेंट नहीं। इस साल एप्रेजल मिलेगा, अबकी बार तो पक्का, फिर आर्थिक मंदी का हवाला, फिर उबरने की कोशिशों के बीच चार साल तक लोगों ने बर्दाश्त किया। अब कोई जेनुइन वजह नहीं रह गयी और लोगों के बीच गहरा असंतोष है।
जेनुइन वजह तो तब भी नहीं थी जब विश्व आर्थिक मंदी का दौर चल रहा था। केपीएमजी की वार्षिक रिपोर्ट पर गौर करें, तो बाकी सेक्टर के मुकाबले इस सेक्टर पर कम असर हुआ। अगर आप टीवीटुडे नेटवर्क की बैलेंस सीट से मिलान करें तो संभव है कुछ वैसे ही नतीजे सामने आएंगे कि हाउस को कोई नुकसान नहीं हुआ। हां अनुमान लगाया जा सकता है कि इसी दौरान संस्थान ने नये वेंचर खड़ा करने और उसे विस्तार देने के फैसले लिये, इनवेस्ट किया। इसका मतलब कोई चाहे तो आसानी से निकाल सकता है कि जो पैसे वहां के लोगों के इनक्रीमेंट के खाते में जाने चाहिए थे, उसे वेंचर को विस्तार देने के काम में लगाया गया। ये तस्वीर अमिताभ के सिनेमा में मिल मजदूरों की दिखायी गयी हालत से कुछ अलग नहीं है। आर्थिक स्तर पर पूंजीवाद से कार्पोरेट में घुस आया हमारा विकास भले ही ज्यादा चमकीला दिखाई देता हो लेकिन शोषण का असर पूंजीवाद से कम बदतर नहीं है।
अब स्थिति ये है कि मीडिया इंडस्ट्री के भीतर का जो माहौल है, उसमें कोई भी सेफ जोन में नहीं है। वीओआई जैसे टाइटेनिक जहाज के डूबने, पीटर मुखर्जी के आइनेक्स को जहांगीर पोचा जैसे शख्स के हाथों बेचने, न्यूज24 के लड़खड़ाने जैसे मामलों के बीच लोगों को ये समझ आने लगा है कि महज पूंजी के बल पर मीडिया का धंधा करना आसान काम नहीं है। इस बीच बड़े-बड़े नामों के धुर्रे उड़ गये। जो कभी ऑडिएंस के दिलों पर राज करते रहे, कलेजे पर सवार रहे, उनका आज कोई नामलेवा नहीं है। किसी बड़े बाबा का हाथ थामकर आंख मूंदकर दूसरे चैनल में कूदने से क्या हश्र होता है, ये लोग पंडिजी के साथ जाकर लोग झेल चुके हैं और उसके शिकार अभी भी लोग भटक रहे हैं। कुल मिलाकर इंडस्ट्री के भीतर स्थिति इतनी आसान नहीं है कि कोई कहीं भी छोड़कर आसानी से चला जाए और वो भी आजतक से… तो सवाल है कि आदमी करे तो क्या करे? चार साल से जो जहां जिस पगार पर काम कर रहा है, कर रहा है। इन तीन-चार सालों में एक बड़ा मिथक टूटा है कि मीडिया इंडस्ट्री में अथाह पैसा है। ये बात कम से कम निचले और बीच के स्तर के लोगों पर तो अब लागू नहीं ही होती।
आजतक शुरू से दूरदर्शी चैनल रहा है। उसे इस बात का शुरू से आभास रहा है कि आनेवाले समय में टीमें टूट सकती हैं, लोग बिखर सकते हैं इसलिए जानकारी ही बचाव की तर्ज पर उसने अपनी नर्सरी में ही आजतक के मीडियाकर्मियों की पौध तैयार करनी शुरू की। टीवीटीएमआइ के जरिए हर साल 25-30 ऐसे मीडियाकर्मी तैयार किये जाते रहे हैं जो कि इंट्री के पहले दिन से ही टीआरपी के बताशे बनाने के बीच सांस लेना शुरू कर देते हैं। ये कितने काबिल मीडियाकर्मी हैं और होंगे (चार साल में हमने यहां से निकले एक का भी नाम नहीं सुना), इस बहस में न भी जाएं तो भी टीआरपी का खेल भंडुल न हो, इसकी तैयारी चैनल ने पहले से कर रखी है। यहां आनेवाला शख्स इस बात से खुश होता है कि करीब डेढ़ लाख देकर वो देश के सबसे तेज चैनल का मीडियाकर्मी बन ही जाएगा। असल जिंदगी में वो सबसे लद्धड़ भी रहा, तो फर्क नहीं पड़ता। जिस कॉनफिडेंस के साथ वो ट्रेनी के कार्ड से चैनल का दरवाजा खोलता है, अच्छे से अच्छा पुराना मीडियाकर्मी उसके आगे मद्धिम पड़ जाए। वैसे भी जहां दूसरे संस्थान इससे कहीं अधिक पैसे लेकर इंटर्नशिप तक की गारंटी नहीं देते, उस लिहाज से तो ये इंस्टीट्यूट अच्छा ही है न।
लेकिन, यहां से पासआउट लोगों की हालत तो ऊपर के कसमसा रहे मीडियाकर्मियों से भी बदतर है। आये दिन खुलनेवाले नये चैनलों के झांसे में ही आकर सही, वो आजतक के नाम पर दूसरे चैनलों के बड़े पद पर फिर भी जा सकते हैं, चैनल लांच करानेवाली टीम का सेहरा अपने ऊपर बांध सकते हैं लेकिन इस संस्थान के लोग तीन साल से पहले कहीं नहीं जा सकते। इन्हें जो रकम इस दौरान दी जाती है और जिस कॉन्ट्रेक्ट पेपर पर साइन कराये जाते हैं, वो पीपली लाइव के सीन की याद दिलाता है। नत्था को लालबहादुर दिया जाता है। लालबहादुर यानी हरे रंग का एक चापानल। जो रंग नत्था के चेहरे पर हरियाली बिखेरने के बजाय चिंता बिखेरता है। पेपर पर अंगूठा लगाने के बाद वो आत्महत्या भी नहीं कर सकता, अगर करता है तो पैसे नहीं मिलेंगे। तो आजतक के भीतर एक बड़ी तादाद में लालबहादुर पा चुके मीडियाकर्मी काम कर रहे हैं, जिनका टीआरपी के बताशे बनाने में कितनी भूमिका है, नहीं पता – लेकिन उनकी हालत नत्था के करीब है।
इस तरह कहानी बनती है कि चैनल का बिजनेस, ब्रांडिंग और टीआरपी के लिहाज से जो हाल है, उसके लिए जिम्मेदार अगर मौजूदा टीम है, तो चैनल के लोगों की जो अंदरूनी हालत है, उसके लिए भी कौन जिम्मेदार है, इस पर बहस होनी चाहिए। बाहर से अनुमान लगाने की स्थिति में मेरी कई स्थापनाएं गलत हो सकती हैं, उसे आगे दुरुस्त किया जा सकता है। लेकिन आजतक के कई मिथक अगर टूटते हैं, सरकारी नौकरी की तरह ये निश्चिंत होकर काम करने का मीडिया संस्थान नहीं रह गया है तो इस मिथक के टूटने के तमाम कारणों पर भी विचार करने की जरूरत है। हम अपने सबसे पुराने चैनल को (कभी भी दूरदर्शन का दर्शक नहीं रहा, जिसके हिसाब से हम अपने उम्र की गिनती मिलाते हैं) इस तरह तार-तार होता नहीं देखना नहीं चाहते। इस लिहाज से इस पर बात करना, बहस करना जरूरी लगता है।
मोहल्लालाइव पर एक पोस्ट के जरिए वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार राजकिशोर को बिका हुआ बताया गया। राजकिशोर के बारे में लिखा गया कि वो विभूति-प्रसंग पर विभूति नारायण राय के पक्ष में हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं। जिस विभूति के विरोध में देश के सैंकड़ों लेखक और लिटरेचरप्रेमी खड़े हैं,वो उनके बचाव के लिए खुलकर सामने आ गए हैं। राजकिशोर ने इस पोस्ट की प्रतिक्रिया में आज मोहल्लालाइव पर एक पोस्ट लिखी है और इन सारी बातों का जबाब देने के बजाय पाठकों से अतिरिक्त सहानुभूति बटोरने की कोशिश की है। राजकिशोर की बातों का कोई भी तार्किक आधार नहीं है। लिहाजा उनकी इस पोस्ट से भावुक तो हुआ जा सकता है लेकिन उनके डीफेंस में आने की स्थिति नहीं बनती। एक पाठक की हैसियत से जिसने की साढ़े तीन रुपये लगाकर जनसत्ता खरीदी और उनके लेखों को पढ़ा,मैं अपनी असहमति दर्ज करता हूं। ये जितना राजकिशोर के एक पाठक की असहमति है,उससे कहीं ज्यादा एक उपभोक्ता का अधिकार। कमेंट की शक्ल में ये मोहल्लालाइव पर मौजूद है लेकिन यहां बतौर पोस्ट आपके सामने-
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राजकिशोरजी,
आपके अलावा बाकी लोगों को भी मैंने शुरु से ही उनके बारे में जानने से कहीं ज्यादा पढ़ना पसंद किया है। अगर मुझे लगा कि इन्हें पढ़ जाना चाहिए। एक हद तक मैंने उसी आधार पर उनके प्रति धारणा भी बनायी। फिलहाल इस बहस में न जाएं कि एक घोर सामंती भी मुक्ति की अगर रचना करे तो आप उसके प्रति कैसी धारणा बनाएंगे,इस पर फिर कभी।
आपकी मेहनत,काबिलियत,लगातार अपने को खराद पर घिसकर कमाने की आदत पर न तो हमें पहले कभी शक था और न ही अभी है। आप या कोई भी जीवन में रोजी-रोजगार के लिए किस तरह के माध्यमों का चुनाव करता है,ये उसका व्यक्तिगत फैसला है। संभव है इस देश में जूते गांठकर या फिर लॉटरी,शेयर की टिकटें और फार्म बेचकर कविताएं लिख रहा हो,कहानियां लिखता हो। इसलिए आप इस बहस में इन बातों को शामिल न करें,बहुत होगा तो इससे हम पाठकों पर आपके प्रति भावुकता, संवेदनशीलता या सहानुभूति का रंग पहले से और गाढ़ा होगा। आप ही नहीं हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य में कमोवेश सभी लोग इसी तरह से आगे बढ़ते हैं,उसी तरह का जीवन जीते हुए आगे जाते हैं।..लेकिन आपके इस हवाले से कहीं भी ये साफ नहीं होता कि आप सिद्धांतों के बजाय मूल्यों को जब चुनते हैं तो उसका आधार क्या हुआ करता है? माफ कीजिएगा,बहुत ही बेसिक बातें जब अवधारणा की शक्ल में गढ़ी जाने लगती है तो बेचैनी महसूस होती है। हम आपसे वो मानसिक प्रक्रिया की व्याख्या नहीं जानना चाह रहे जिसके तहत आप सिद्धांतों औऱ मूल्यों को अलग कर पाते हैं, फिर सिद्धांतों को साइड रहने को कहते हैं और मूल्यों का अंगीकार करते हैं।
आपके अलावा बाकी लोगों को भी मैंने शुरु से ही उनके बारे में जानने से कहीं ज्यादा पढ़ना पसंद किया है। अगर मुझे लगा कि इन्हें पढ़ जाना चाहिए। एक हद तक मैंने उसी आधार पर उनके प्रति धारणा भी बनायी। फिलहाल इस बहस में न जाएं कि एक घोर सामंती भी मुक्ति की अगर रचना करे तो आप उसके प्रति कैसी धारणा बनाएंगे,इस पर फिर कभी।
आपकी मेहनत,काबिलियत,लगातार अपने को खराद पर घिसकर कमाने की आदत पर न तो हमें पहले कभी शक था और न ही अभी है। आप या कोई भी जीवन में रोजी-रोजगार के लिए किस तरह के माध्यमों का चुनाव करता है,ये उसका व्यक्तिगत फैसला है। संभव है इस देश में जूते गांठकर या फिर लॉटरी,शेयर की टिकटें और फार्म बेचकर कविताएं लिख रहा हो,कहानियां लिखता हो। इसलिए आप इस बहस में इन बातों को शामिल न करें,बहुत होगा तो इससे हम पाठकों पर आपके प्रति भावुकता, संवेदनशीलता या सहानुभूति का रंग पहले से और गाढ़ा होगा। आप ही नहीं हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य में कमोवेश सभी लोग इसी तरह से आगे बढ़ते हैं,उसी तरह का जीवन जीते हुए आगे जाते हैं।..लेकिन आपके इस हवाले से कहीं भी ये साफ नहीं होता कि आप सिद्धांतों के बजाय मूल्यों को जब चुनते हैं तो उसका आधार क्या हुआ करता है? माफ कीजिएगा,बहुत ही बेसिक बातें जब अवधारणा की शक्ल में गढ़ी जाने लगती है तो बेचैनी महसूस होती है। हम आपसे वो मानसिक प्रक्रिया की व्याख्या नहीं जानना चाह रहे जिसके तहत आप सिद्धांतों औऱ मूल्यों को अलग कर पाते हैं, फिर सिद्धांतों को साइड रहने को कहते हैं और मूल्यों का अंगीकार करते हैं।
जिस पोस्ट में आपको बिका हुआ बताया गया और कहा गया कि आप विभूति नारायण के पक्ष में हस्ताक्षर करवा रहे हैं,आपने आज की पोस्ट में कहीं एक लाइन में भी इसका खंडन किया कि नहीं आप ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं? और अगर कर रहे हैं तो उसके पीछे मूल्यों की वो कौन सी ताकतें हैं जो आपको विभूति के पक्ष में खड़े होने के लिए ज्यादा प्रेरित करती है। जिसके आगे सिद्धांत दौ कौड़ी की चीज बनकर रह जाती है? आपने इस मुद्दे पर सीरियसली( महसूस भले ही कर रहे हों) बात करने के बजाय हम पाठकों पर इमोशनल अत्याचार कर गए। कब तक हिन्दी समाज के बाकी लोगों की तरह उद्धव की ज्ञान की गठरी को भावना के आगे दो कौड़ी की चीज करार देते रहेंगे,ज्ञान की गठरी के आंधी में तब्दील होने और फिर कोरी भावुकता,छद्म की टांट उड़ने की भी तो कहानी बताया करें।
राजकिशोरजी,माफ कीजिएगा,अनुभव और समझदारी के स्तर पर मैं आपके आगे बहुत ठिगना हूं लेकिन इतना जरुर समझ पाता हूं कि कोई भी लेखक या पत्रकार किसी घोषणा के तहत नहीं लिखता कि वो कोई सिद्धांत गढ़ने जा रहा है। लिखते वक्त उसके सामने मूल्य ही सक्रिय रहते हैं जो मूल्य वगैरह बातों को बकवास मानते हैं उनके आगे संपादक की डिमांड,मानदेय आदि। लेकिन लिखते हुए वो मूल्य या फिर डिमांड एंड सप्लाय का लेखन एक समय के बाद एक सैद्धांतिक आकार तो ले ही लेता है न। अब ये सिद्धांत किसी भी लेखक के चुनाव करने या न करने का मसला नहीं रह जाता। ये एक ठोस आधार के तौर पर पाठकों के सामने काम करने लग जाते हैं। अब जो लेखक कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो का भावानुवाद,उसके सांचे में ही कविता,कहानी,उपन्यास लिखते हुए विचारों की वरायटी गढ़ रहा हो,उसकी बात थोड़ी अलग जरुर है.इसमें भी सिद्धांत का एक आधार तो जरुर बनता है जो कि उसे बाकी के लोगों से अलग करता है।
आपको पढ़ते हुए बहुत मोटी बात है जो कि किसी भी आपके रोजमर्रा लेख और रोजमर्रा पाठक के पढ़ने के दौरान समझ आ जाती है आप स्त्री मामले को लेकर काफी संजीदा है। आप भले ही इसे सिद्धांत न मानें लेकिन आपको देखने-समझने का एक सैद्धांतिक आधार स्त्री लेखन तो है ही न। अब आपको यहां आकर बताना होगा कि आपने किस मूल्य के तहत( सिद्धांत को तो पहले ही खारिज कर चुके है) विभूति-प्रसंग में जो कुछ भी हुआ,उसे आप किस मूल्य के तहत देखते हैं,उसके पक्ष में हैं? ये बहुत ही सपाट बात है जिसके लिए मुझे नहीं लगता कि आपको आरोपों की फेहरिस्त जुटाकर मामले को भटकाने की जरुरत होगी। वैसे लेख की शक्ल में तो पाठक कुछ भी पढ़ ही लेगा लेकिन यहां आकर आपको इसे लेख का मुद्दा नहीं एक सवाल के तौर पर लेना चाहिए।..सबकुछ छोड़कर और अंत में प्रार्थना की मोड में आ जाना तो हिन्दी समाज की आदिम प्रवृत्ति है ही जिससे आप भी न बच सकें।
आपसे सवाल करने की हैसियत मेरी बस इतनी है कि कई मर्तबा आपके लेख के लिए मैंने साढ़े तीन रुपये की जनसत्ता खरीदी है और मैंने जिस लेखक के लिए पैसे खर्च किए हैं,उनसे ये जानने का अधिकार तो रखता ही हूं। हिन्दी में ये बदतमीजी समझी जाएगी लेकिन बाजार की भाषा में ये एक उपभोक्ता अधिकार है।
इस अल्सायी और मेरे लिए लंबे समय से ह्रासमेंट में धकेलती आयी दुपहरी में अविनाश ने जैसे ही बताया कि गिरदा नहीं रहे तो सोने-सोने को होने आयी आंखों में बरबस आंसू आ गए। अविनाश ने उनकी उन तस्वीरों की ताकीद की जिसे कि हमने दून रीडिंग्स के दौरान देहरादून में लिए थे। हमें एकबारगी अपनी गलती का एहसास हुआ कि हम क्यों एक ऐसे फोटो पत्रकार साथी के भरोसे रह गए जिन्होंने हमें इस बिना पर ज्यादा तस्वीरें नहीं लेने दी कि वो सब दे देंगे और दूसरा कि जो भी तस्वीरें ली उसे आज दिन तक भेजी नहीं। हम गिरदा की तस्वीरें खोजने की पूरी कोशिश में जुटे हैं।
गिरदा के बारे में न तो हमें बहुत अधिक जानकारी है और न ही वो जो अब तक गाते आए हैं,उसकी कोई गहरी समझ। कविता और गीत के प्रति एक नकारात्मक रवैया शुरु से रहा है इसलिए इसकी जानकारी मं शुरु से बाधा आती रही है। सुबह के विमर्श और तीन घंटे के लिए मसूरी से लौटने के बाद पेट में हायली रिच खाना गया तो न तो कुछ और सुनने की इच्छा हो रही थी और न ही कुछ कहने की। हम कुर्सी में धंसकर सोना चाहते थे,बैठना नहीं। तभी गिरदा दूसरे सत्र में मंच पर होते हैं। ये वो सत्र रहा जिसमें कि गिरदा सहित बाकी लोगों ने उत्तराखंड के लोगों के दर्द को गाकर या कविता की शक्ल में हमसे साझा किया। गिरदा ने जब गाना शुरु किया तो लगातार भीतर से आत्मग्लानि का बोध होता रहा। दो तरह की पनीर,करीब 80-90 रुपये किलो के चावल,रायता और तमाम रईसजादों का खाना खाकर जब हम जंगली साग रांधने(पकाने) की बात गिरदा के स्वरों में सुनने लगे तो ऐसा होना स्वाभाविक ही था। गिरदा के गीत सुनकर हमें उबकाई आने लगी। हमारा जिगरा इतना बड़ा तो नहीं कि लोगों के दर्द को सुनकर अपना सुख और प्लेजर को लात मार दें लेकिन उस समय जो खाया था,उसकी उबकाई हो जाती और फिर गिरदा को सुनता,तब उन गीतों के साथ न्याय हो पाता। गिरदा के गाने की जो आवाज थी,वो इतनी बारीक लेकिन दूर तक जानेवाली,इतनी दूर जानेवाली कि देहरादून,मसूरी की पहाडियों में जो वीकएंड,हनीमून मनाने आते हैं, गरीबी और भूखमरी पर विमर्श करने आते हैं,कॉर्पोरेट की टेंशन लेकर यहां चिल्ल होने आते हैं,उन सबके कलेजे में नश्तर की तरह चुभती चली जाए। वो अपने गीतों में हद तक लोगों के बेशर्म होने का एहसास भरते। गिरदा को सुनने से तिल-तिलकर मरते हुए गीतकार के सामने से गुजरने का एहसास होता जिसका हर अंतरा,हर मुखड़ा सुनने के बाद कब्र और नजदीक होती जाती। मफल्ड ड्रम की हर बीट जैसे मुर्दे को कब्र के नजदीक ले जाती है। उनको सुनने से ऐसा लगता था कु दूर कोई पहाड़ की तलहटी में ऐसा शख्स गा रहा है जिसके पेट तीर से छलनी हो और गले में खून जमा हुआ है।
डेढ़ से दो घंटे की सेशन में गिरदा को सुनकर हम सचमुच पागल हो गए थे। छूटते ही हमने तय किया कि उनके कुछ गीतों की हम अलग से रिकार्डिंग करेंगे। लोग उनकी सीडी,कैसेट निकालने की बात कर रहे थे लेकिन उसमें उलझनें जानकर हमने तय किया था कि कुछ नहीं तो रिकार्ड करके यूट्यूब पर डाल देंगे। मैं तब अकेले गिरदा के पास गया और कहा कि ऐसा कुछ करना चाहते हैं। वो बच्चे की तरह खुश हो गए। साथ में अविनाश भी ऐसा करने में बहुत उत्साह दिखाया। लेकिन हम दिल्ली आते-आते तक ऐसा नही कर सके। उस रात डिनर में गिरदा अपनी मौज में थे। शेखर पाठक,पुष्पेश पंत और दिल्ली से गए तमाम साहित्यकारों के बीच वो उफान पर थे..सब तरह से। लेकिन हम उनका कोई भी गीत रिकार्ड न कर पाए।
देहरादून की होटल में देर रात हमने उनके लिए सिर्फ इतना लिखा- गिरदा ने हमें पागल कर दिया
तीन घंटे की थकान लेकर जब हम वापस होटल अकेता के सेमिनार हॉल में दाखिल हुए, तब गिरदा ने अपना जादू-जाल फैलाना शुरू ही किया था। गिरदा अपने गानों में उत्तराखंड के भूले-बिसरे चेहरों और यादों को फिर से अपनी आवाज के जरिये सामने लाते हैं। वो जब भी गाते हैं, उनकी आवाज पहाड़ी जीवन के संघर्षों को दर्शाती है। इन्होंने फैज की कई कविताओं का अनुवाद भी किया है। गिरदा ने जब हमें सुनाया कि चूल्हा गर्म हुआ है, साग के पकने की गंध चारों ओर फैल रही है और आसमान में चांद कांसे की थाली की तरह टंगा है, तो बाबा नागार्जुन आंखों के आगे नाचने लग गये। यकीन मानिए आप गिरदा को सुनेंगे तो पागल हो जाएंगे। मैं दिल्ली आते ही उनके गाये गीतों का ऑडियो लोड करता हूं।
लेकिन,हम उस दिन से लेकर आज दिन तक कोई ऑडियो अपलोड नहीं कर पाए। जब अब तक नहीं किया तो क्या कर पाएंगे? सोचता हूं तो लगता है कि हम गिरदा के कुछ गाने अगर रिकार्ड करते तो क्या खर्चा जाता। गिरदा तो हमसे लगातार बस बीड़ी मिलती रहने की शर्त पर गाने को तैयार थे..
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गिरदा के बारे में न तो हमें बहुत अधिक जानकारी है और न ही वो जो अब तक गाते आए हैं,उसकी कोई गहरी समझ। कविता और गीत के प्रति एक नकारात्मक रवैया शुरु से रहा है इसलिए इसकी जानकारी मं शुरु से बाधा आती रही है। सुबह के विमर्श और तीन घंटे के लिए मसूरी से लौटने के बाद पेट में हायली रिच खाना गया तो न तो कुछ और सुनने की इच्छा हो रही थी और न ही कुछ कहने की। हम कुर्सी में धंसकर सोना चाहते थे,बैठना नहीं। तभी गिरदा दूसरे सत्र में मंच पर होते हैं। ये वो सत्र रहा जिसमें कि गिरदा सहित बाकी लोगों ने उत्तराखंड के लोगों के दर्द को गाकर या कविता की शक्ल में हमसे साझा किया। गिरदा ने जब गाना शुरु किया तो लगातार भीतर से आत्मग्लानि का बोध होता रहा। दो तरह की पनीर,करीब 80-90 रुपये किलो के चावल,रायता और तमाम रईसजादों का खाना खाकर जब हम जंगली साग रांधने(पकाने) की बात गिरदा के स्वरों में सुनने लगे तो ऐसा होना स्वाभाविक ही था। गिरदा के गीत सुनकर हमें उबकाई आने लगी। हमारा जिगरा इतना बड़ा तो नहीं कि लोगों के दर्द को सुनकर अपना सुख और प्लेजर को लात मार दें लेकिन उस समय जो खाया था,उसकी उबकाई हो जाती और फिर गिरदा को सुनता,तब उन गीतों के साथ न्याय हो पाता। गिरदा के गाने की जो आवाज थी,वो इतनी बारीक लेकिन दूर तक जानेवाली,इतनी दूर जानेवाली कि देहरादून,मसूरी की पहाडियों में जो वीकएंड,हनीमून मनाने आते हैं, गरीबी और भूखमरी पर विमर्श करने आते हैं,कॉर्पोरेट की टेंशन लेकर यहां चिल्ल होने आते हैं,उन सबके कलेजे में नश्तर की तरह चुभती चली जाए। वो अपने गीतों में हद तक लोगों के बेशर्म होने का एहसास भरते। गिरदा को सुनने से तिल-तिलकर मरते हुए गीतकार के सामने से गुजरने का एहसास होता जिसका हर अंतरा,हर मुखड़ा सुनने के बाद कब्र और नजदीक होती जाती। मफल्ड ड्रम की हर बीट जैसे मुर्दे को कब्र के नजदीक ले जाती है। उनको सुनने से ऐसा लगता था कु दूर कोई पहाड़ की तलहटी में ऐसा शख्स गा रहा है जिसके पेट तीर से छलनी हो और गले में खून जमा हुआ है।
डेढ़ से दो घंटे की सेशन में गिरदा को सुनकर हम सचमुच पागल हो गए थे। छूटते ही हमने तय किया कि उनके कुछ गीतों की हम अलग से रिकार्डिंग करेंगे। लोग उनकी सीडी,कैसेट निकालने की बात कर रहे थे लेकिन उसमें उलझनें जानकर हमने तय किया था कि कुछ नहीं तो रिकार्ड करके यूट्यूब पर डाल देंगे। मैं तब अकेले गिरदा के पास गया और कहा कि ऐसा कुछ करना चाहते हैं। वो बच्चे की तरह खुश हो गए। साथ में अविनाश भी ऐसा करने में बहुत उत्साह दिखाया। लेकिन हम दिल्ली आते-आते तक ऐसा नही कर सके। उस रात डिनर में गिरदा अपनी मौज में थे। शेखर पाठक,पुष्पेश पंत और दिल्ली से गए तमाम साहित्यकारों के बीच वो उफान पर थे..सब तरह से। लेकिन हम उनका कोई भी गीत रिकार्ड न कर पाए।
देहरादून की होटल में देर रात हमने उनके लिए सिर्फ इतना लिखा- गिरदा ने हमें पागल कर दिया
तीन घंटे की थकान लेकर जब हम वापस होटल अकेता के सेमिनार हॉल में दाखिल हुए, तब गिरदा ने अपना जादू-जाल फैलाना शुरू ही किया था। गिरदा अपने गानों में उत्तराखंड के भूले-बिसरे चेहरों और यादों को फिर से अपनी आवाज के जरिये सामने लाते हैं। वो जब भी गाते हैं, उनकी आवाज पहाड़ी जीवन के संघर्षों को दर्शाती है। इन्होंने फैज की कई कविताओं का अनुवाद भी किया है। गिरदा ने जब हमें सुनाया कि चूल्हा गर्म हुआ है, साग के पकने की गंध चारों ओर फैल रही है और आसमान में चांद कांसे की थाली की तरह टंगा है, तो बाबा नागार्जुन आंखों के आगे नाचने लग गये। यकीन मानिए आप गिरदा को सुनेंगे तो पागल हो जाएंगे। मैं दिल्ली आते ही उनके गाये गीतों का ऑडियो लोड करता हूं।
लेकिन,हम उस दिन से लेकर आज दिन तक कोई ऑडियो अपलोड नहीं कर पाए। जब अब तक नहीं किया तो क्या कर पाएंगे? सोचता हूं तो लगता है कि हम गिरदा के कुछ गाने अगर रिकार्ड करते तो क्या खर्चा जाता। गिरदा तो हमसे लगातार बस बीड़ी मिलती रहने की शर्त पर गाने को तैयार थे..
पीपली लाइव "इन्क्वायरिंग माइंड" की फिल्म है। हममें से कुछ लोग जो काम सोशल एक्टिविज्म, आरटीआई, ब्लॉग्स,फेसबुक,ट्विटर के जरिए करने की कोशिश करते हैं,वो काम अनुषा रिजवी,महमूद फारुकी और उनकी टीम ने फिल्म बनाकर की है। इसलिए हम जैसे लोगों को ये फिल्म बाकी फिल्मों की तरह कैरेक्टर के स्तर पर खुद भी शामिल होने से ज्यादा निर्देशन के स्तर पर शामिल होने जैसी लगती है। फिल्म देखते हुए हमारा भरोसा पक्का होता है कि सब कुछ खत्म हो जाने के बीच भी,संभावना के बचे रहने की ताकत मौजूद है। इस ताकत से समाज का तो पता नहीं लेकिन खासकर मीडिया और सिनेमा को जरुर बदल जा सकता है। ऐसे में ये हमारे समुदाय के लोगों की बनायी गयी फिल्म है। इस फिल्म में सबसे ज्यादा इन्क्वायरिंग मीडिया को लेकर है,किसानों की आत्महत्या और कर्ज की बात इस काम के लिए एक सब्जेक्ट मुहैया कराने जैसा ही है।
फिल्म की शुरुआत जिस तरह से एक लाचार किसान परिवार के कर्ज न चुकाने, जमीन नीलाम होने की स्थिति,फिर नत्था(ओंकार दास) के आत्महत्या करने की घोषणा से होती है, उससे ये जरुर लगता है कि ये किसान समस्या पर बनी फिल्म है। लेकिन आगे चलकर कहानी का सिरा जिस तरफ मुड़ता है,उसमें ये बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि ये सिर्फ किसानों की त्रासदी और उन पर राजनीतिक तिगड़मों की फिल्म नहीं है। सच बात तो ये है कि ये फिल्म जितनी किसानों के कर्ज में दबकर मरने और आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाने की कहानी है,उससे कहीं ज्यादा बिना दिमाग के, भेड़चाल में चलनेवाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बीच से जर्नलिज्म के खत्म होने और जेनुइन पत्रकार के पिसते-मरते जाने की कहानी है। ये न्यूज चैनलों के एडीटिंग मशीन की उन संतानों पर बनायी गई फिल्म है जो बताशे चीनी के नहीं,खबरों के बनाते हैं। न्यूज चैनल्स किस तरह से अपनी मौजूदगी,गैरबाजिव दखल और अपाहिज ताकतों के दम पर पहले से बेतरतीब समाज और सिस्टम को और अधिक वाहियात और चंडूखाने की शक्ल देते हैं,फिल्म का करीब-करीब आधा हिस्सा इस बात पर फोकस है। लेकिन
मेनस्ट्रीम मीडिया( यहां पर न्यूज चैनल्स) ने इसे किसान पर बनी फिल्म बताकर इसके पूरे सेंस को फ्रैक्चर करने की कोशिश की है। मंहगाई डायन को अपने काम का जान खूब निचोड़ा,संसद के अधिवेशन को इससे जोड़ा लेकिन वो इस फिल्म में मीडिया ऑपरेशन और ट्रीटमेंट के दिखाए जाने की बात को सिरे से पचा जाते हैं। इसकी बड़ी वजह है कि दुनिया की आलोचना करनेवाले चैनलों की आलोचना सिनेमा या नए माध्यम करें,ये उसे बर्दाश्त नहीं। चैनल्स इस बात को पचा नहीं सकते इसलिए वो फिल्म में मीडिया चैनल्स की बेशर्मी की बात को पचा गए। साथ ही जमकर आलोचना के लिए भी चर्चा नहीं कि तो उसकी भी बड़ी वजह है कि उनके पास ये कहने को नहीं है कि बनानेवाले को चैनल की समझ नहीं है। वो निर्देशक की बैकग्राउंड को बेहतर तरीके से जानते हैं। फिल्म "रण" (2010) की तरह तो इस फिल्म के विरोध में दिखावे के लिए ही सही पंकज पचौरी की पंचायत नहीं बैठी और न ही आशुतोष(IBN7) का रंज मिजाज खुलकर सामने आया। हां अजीत अंजुम को अपने फैसले पर जरुर अफसोस हुआ कि पहले बिना फिल्म देखे जो उऩ्होंने इसे बनानेवाले को सैल्यूट किया और फाइव स्टार दे दी,अब फेसबुक पर लिखकर भूल सुधार रहे हैं कि-बहुत से सीन जबरन ठूंसे गए हैं , ताकि टीवी चैनलों के प्रति दर्शकों के भीतर जमे गुस्से को भुनाया जा सके . दर्शक मजे भी लें और हाय - हाय भी करें . लेकिन अतिरंजित भी बहुत किया गया है । इन सबके बीच हमें हैरानी हुई एनडीटीवी इंडिया और उसके सुलझे मीडियाकर्मी विजय त्रिवेदी पर जिन्होंने पीपली लाइव को लेकर सैंकड़ों बोलते शब्दों के बीच एक बार भी मीडिया शब्द का नाम नहीं लिया। छ मिनट तो जो हमने देखा उसमें सिर्फ किसान पर बनी फिल्म पीपली लाइव स्लग आता रहा। हमें हैरानी हुई आजतक पर जिसने "सलमान को छुएंगे आमिर,वो हो जाएगा हीरा" नाम से स्पेशल स्टोरी चलायी लेकिन एक बार भी पीपीली लाइव के साथ चैनल शब्द नहीं जोड़ा( गोलमोल तरीके से मीडिया शब्द,वो भी व्ऑइस ओवर में)। न्यूज चैनलों की जब भी आलोचना की जाती है,वो इसमें मीडिया शब्द घुसेड़ देते हैं ताकि उसमें प्रिंट भी शामिल हो जाए और उन पर आलोचना का असर कम हो। ये अलग बात है कि खबर का असर में अपने चैनल का नाम चमकाने में रत्तीभर भी देर नहीं लगाते। इस पूरे मामले में पीपली लाइव फिल्म देखकर न्यूज चैनलों की जो इमेज बनती है वो इस फिल्म की कवरेज को लेकर बननेवाली इमेज से मेल खाती है। ऐसे में फिल्म के भीतर चैनल्स ट्रीटमेंट को पहले से और अधिक विश्वसनीय बनाता है। हमें अजीत अंजुम की तरह जबरदस्ती ठूंसा गया बिल्कुल भी नहीं लगता। हां ये जरुर है कि..
घोषित तौर पर मीडिया को लेकर बनी फिल्म "रण"की तरह पीपली लाइव ने मीडिया पर बनी फिल्म के नाम पर स्टार न्यूज पर दिनभर का मजमा नहीं लगाया, IBN7 को स्टोरी चलाने के लिए नहीं उकसाया, आजतक को घसीटने का मौका नहीं दिया। लेकिन ये रण से कहीं ज्यादा असरदार तरीके से न्यूज चैनलों के रवैये पर उंगली रखती है। रण पर हमारा भरोसा इसलिए भी नहीं जमता कि उसमें चैनलों की आलोचना के वाबजूद तमाम न्यूज चैनलों से एक किस्म की ऑथेंटिसिटी बटोरी जाती है। जिस चैनल संस्कृति की आलोचना फिल्म रण करती है,वही दिन-रात इन चैनलों की गोद का खिलौना बनकर रह जाता है और सबके सब विजय मलिक( अमिताभ बच्चन) के पीछे भागते हैं। नतीजा फिल्म देखे जाने के पहले ही अविश्वसनीय और मजाक लगने लगती है। फिल्म के भीतर की कहानी इस अविश्वास को और मजबूत तो करती ही है,हमें रामगोपाल वर्मा की मीडिया समझ पर संदेह पैदा करने को मजबूर करती है। स्टार न्यूज पर दीपक चौरसिया के साथ टहलते हुए अमिताभ बच्चन भले ही बोल गए हों कि उन्होंने इस फिल्म के लिए चैनल को समझा,लगातार वहां गए लेकिन फिल्म के भीतर वो एक मीडिया प्रैक्टिसनर के बजाय क्लासरुम के मीडिया उपदेशक ज्यादा लगे। चैनल ऑपरेशन को जिसने गोलमोल तरीके से दिखाया गया, विजय मलिक चरित्र को जिस मीडिया देवदूत के तौर पर स्टैब्लिश किया है,ऐसे में ये फिल्म चैनल की संस्कृति की वाजिब आलोचना करने से चूक जाती है। इस लिहाज से कहीं बेहतर फिल्म शोबिज(2007) है जिसकी बहुत ही कम चर्चा हुई।
न्यूज चैनलों को लेकर लोगों के बीच जो बाजिव गुस्सा और अजूबे की दुनिया के तौर पर जो कौतूहल है उस लिहाज से सिनेमा में चैनलों को शामिल किए जाने का ट्रेंड शुरु हो गया है। फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी से लेकर शोबिज,मोहनदास,रण,एलएसडी और अब पीपली लाइव हमारे सामने है। दूसरी तरफ मीडिया पार्टनरशिप के तहत रंग दे बसंती,देवडी,गजनी,फैशन,कार्पोरेट जैसी तमाम फिल्में हैं जिसे देखते हुए सिनेमा के भीतर के न्यूज चैनल्स पर बात की जा सकती है। लेकिन इन सबके बीच एक जरुरी सवाल है कि न्यूज चैनलों के मामले में सिनेमा ऑडिएंस रिएक्शन को,चैनल संस्कृति को और आलोचना के टूल्स को कितनी बारीकी और व्यावहारिक तरीके से पकड़ पाता है? इस स्तर पर पीपली लाइव की न्यूज चैनलों की समझ बाकी फिल्मों से एकदम से अलग करती है।
पीपली लाइव चैनल संस्कृति की आलोचना के लिए किसी चैनल से अपने को ऑथराइज नहीं कराती है। हां ये जरुर है कि फिल्म की जरुरत के लिए एनडीटीवी 24x7 और IBN7 का सहयोग लेती है। ये फिल्म रण की तरह विजय मलिक के इमोशनल स्पीच की बदौलत चैनल के बदल जाने का भरोसा पैदा करने की कोशिश नहीं करती है। न ही रामगोपाल वर्मा की तरह पूरब( रीतेश देशमुख) को खोज लेती है जिसके भीतर एस पी सिंह या प्रणव रॉय की मीडिया समझ फिट करने में आसानी हो। मोहनदास( 2009) का स्ट्रिंगर दिल्ली में आकर चकाचक पत्रकार हो जाता है। लेकिन ये फिल्म ट्रू जर्नलिज्म का उत्तराधिकारी चुनकर हमें देने के बजाय चैनल को कैसे बेहतर किया जाए,ये सवाल ऑडिएंस पर छोड़ देती है। इस फिल्म के मुताबिक नत्था की संभावना शहर में है लेकिन राकेश जैसे पत्रकार की संभावना कहां है,इसका जबाब कहीं नहीं है। फिल्म, ये सवाल चैनल के उन तमाम लोगों पर छोड़ देती है जिन्होंने इसे एस संवेदनशील माध्यम के बजाय चंडूखाना बनाकर छोड़ दिया है। फिल्म को लेकर जिस इन्क्वायरी माइंड की बात हमने की, चैनल को लेकर ये माइंड हमें फिल्म के भीतर राकेश( नवाजउद्दीन) नाम के कैरेक्टर में दिखाई देता है। राकेश( नवाजउद्दीन) नंदिता( मलायका शिनॉय) से जर्नलिज्म को लेकर दो मिनट से भी कम के जो संवाद हैं,अगर उस पर गौर करें तो चैनल इन्डस्ट्री पर बहुत भारी पड़ती है। ये माइंड वहीं पीप्ली में ट्रू जर्नलिज्म करते हुए मर जाता है। ऐसे में ये फिल्म मोहनदास और रण के चैनल्स से ज्यादा खतरनाक मोड़ की तरफ इशारा करती है जहां न तो दिल्लीः संभावना का शहर है और न ही कोई उत्तराधिकारी होने की गुंजाइश है। फिल्म की सबसे बड़ी मजबूती कोई विकल्प के नहीं रहने,दिखाने की है।
कुमार दीपक( विशाल शर्मा) के जरिए हिन्दी चैनल की जमीनी पत्रकारिता के नाम पर जो शक्ल उभरकर सामने आती है,संभव है ये नाम गलत रख दिए गए हों लेकिन चैनल का चरित्र बिल्कुल वही है। अजीत अंजुम जिसे जबरदस्ती का ठूंसा हुआ मान रहे हैं,इस पर तर्क देने के बजाय एक औसत ऑडिएंस को एक न्यूज चैनल के नाम पर क्या और कैसी लाइनें याद आती हैं,इस पर बात हो तो नतीजा कुछ अलग नहीं होगा। नंदिता के चरित्र से जिस एलीट अंग्रेजी चैनलों का चरित्र उभरकर सामने आता है,वो राजदीप सरदेसाई की अपने घर की आलोचना से मेल खाती है। वो बार-बार नत्था के अलावे बाकी लोगों को कैमरे की फ्रेम से बाहर करवाती है। फ्रेम से बाहर किए गए लोग समाज से,खबर से हाशिए पर जाने पर की कथा है। ये अंग्रेजी जर्नलिज्म की सरोकारी पत्रकारिता है। ऐसे में ये बहस भी सिरे से खारिज हो जाती है कि ये महज हिन्दी चैनलों की आलोचना है। हां ये जरुर है कि अंग्रेजी चैनल को ज्यादा तेजतर्रार और अपब्रिंग होते दिखाया गया है। इन सबके वाबजूद जिस किसी को भी ये फिल्म चैनलों की जरुरत से ज्यादा खिंचाई जैसा मामला लग रहा है,उसकी बड़ी वजह है कि इस फिल्म ने चैनलों की पॉपुलिज्म सडांध को बताने के लिए कॉउंटर पॉपुलिज्म मेथड अपनाया। उसने उसी तरह के संवाद रचे,शब्दों का प्रयोग किया,जो कि चैनल खबरों के नाम पर किया करते हैं। चैनल को अपने ही औजारों से आप ही बेपर्द हो जाने का दर्द है।
प्राइवेट न्यूज चैनलों को पिछले कुछ सालों से जो इस बात का गुरुर है कि वो देश चलाते हैं,उनमें सरकार बदलने की ताकत है,वो सब इस फिल्म में ऑपरेट होते दिखाया गया है। कई बार सचमुच पूरी मशीनरी इससे ड्राइव होती नजर आती है लेकिन जब चैनलों की हेडलाइंस खुद सलीम साहब(नसरुद्दीन शाह) की भौंहें के इशारे से बदलती हैं तो फिर खुद चैनल को अपनी सफाई में कुछ कहने के लिए नहीं बचता।
चैनल के लिए गंध मचाना एक मेटाफर की तरह इस्तेमाल होता आया है। लेकिन फिल्म में ये गंध अपने ठेठ अर्थ गंदगी फैलाने के अर्थ में दिखाई देता है। नत्था के पीपली से गायब हो जाने की खबर के बाद से मौत का जो मेला लगा था,वो सब समेटा जाने लगता है। सारे चैनल क्र्यू और उनकी ओबी वैन धूल उड़ाती चल देती है। उसके बाद गांव को लेकर फुटेज है। ये फुटेज करीब 10-12 सेकण्ड तक स्क्रीन पर मौजूद रहती है- चारो तरफ पानी की बोतलें,गंदगी,कचरे। पूरा गांव शहरी संस्कार के कूड़ों से भर जाता है।...फिल्म देखने के ठीक एक दिन पहले मैं नोएडा फिल्म सिटी की मेन गेट के बजाय बैक से इन्ट्री लेता हूं। मुझे वहां का नजारा पीपली लाइव की इस फुटेज से मेल खाती नजर आती है। बल्कि उससे कई गुना ज्यादा जायन्ट। दिल्ली या किसी शहर में जहां हम गंदगी के मामले में किसी को भी ट्रेस करके कह नहीं सकते कि ये गंदगी फैलानेवाले लोग कौन है,नोएडा फिल्म सिटी के इस कचरे की अटारी को देखकर आप बिना कुछ किए उन्हें खोज सकते हैं? बल्कि थोड़ा टाइम दें तो काले कचरे की प्रेत पैकटों को ट्रेस कर सकते हैं कि कौन किस हाउस से आया? इस तरह पूरी की पूरी फिल्म लचर व्यवस्था के लिए जिम्मेदार कौन के सवाल से जूझने और खोजने का नाटक करनेवाले चैनलों को सेल्फ एसेस्मेंट मोड(MODE) की तरफ ले जाती है। अब अगर महमूद फारुकी कहते हैं कि हम फिल्म तो बनाने चले थे किसान पर लेकिन बना ली तो पता चला कि हमने तो मीडिया पर फिल्म बना दी- तो ऐसे में चैनल के लोग इसे एक ईमानदार स्टेटमेंट मानकर ऑडिएंस को भरमाने की जगह किसान के बजाय मीडिया एनलिसिस नजरिए से फिल्म को देखना शुरु करें तो शायद इस फर्क को समझ पाएं कि होरी महतो के मर जाने और नत्था के मरने की संभावना के बीच भी कई खबरें हैं,कई पेचीदगियां हैं।
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फिल्म की शुरुआत जिस तरह से एक लाचार किसान परिवार के कर्ज न चुकाने, जमीन नीलाम होने की स्थिति,फिर नत्था(ओंकार दास) के आत्महत्या करने की घोषणा से होती है, उससे ये जरुर लगता है कि ये किसान समस्या पर बनी फिल्म है। लेकिन आगे चलकर कहानी का सिरा जिस तरफ मुड़ता है,उसमें ये बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि ये सिर्फ किसानों की त्रासदी और उन पर राजनीतिक तिगड़मों की फिल्म नहीं है। सच बात तो ये है कि ये फिल्म जितनी किसानों के कर्ज में दबकर मरने और आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाने की कहानी है,उससे कहीं ज्यादा बिना दिमाग के, भेड़चाल में चलनेवाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बीच से जर्नलिज्म के खत्म होने और जेनुइन पत्रकार के पिसते-मरते जाने की कहानी है। ये न्यूज चैनलों के एडीटिंग मशीन की उन संतानों पर बनायी गई फिल्म है जो बताशे चीनी के नहीं,खबरों के बनाते हैं। न्यूज चैनल्स किस तरह से अपनी मौजूदगी,गैरबाजिव दखल और अपाहिज ताकतों के दम पर पहले से बेतरतीब समाज और सिस्टम को और अधिक वाहियात और चंडूखाने की शक्ल देते हैं,फिल्म का करीब-करीब आधा हिस्सा इस बात पर फोकस है। लेकिन
मेनस्ट्रीम मीडिया( यहां पर न्यूज चैनल्स) ने इसे किसान पर बनी फिल्म बताकर इसके पूरे सेंस को फ्रैक्चर करने की कोशिश की है। मंहगाई डायन को अपने काम का जान खूब निचोड़ा,संसद के अधिवेशन को इससे जोड़ा लेकिन वो इस फिल्म में मीडिया ऑपरेशन और ट्रीटमेंट के दिखाए जाने की बात को सिरे से पचा जाते हैं। इसकी बड़ी वजह है कि दुनिया की आलोचना करनेवाले चैनलों की आलोचना सिनेमा या नए माध्यम करें,ये उसे बर्दाश्त नहीं। चैनल्स इस बात को पचा नहीं सकते इसलिए वो फिल्म में मीडिया चैनल्स की बेशर्मी की बात को पचा गए। साथ ही जमकर आलोचना के लिए भी चर्चा नहीं कि तो उसकी भी बड़ी वजह है कि उनके पास ये कहने को नहीं है कि बनानेवाले को चैनल की समझ नहीं है। वो निर्देशक की बैकग्राउंड को बेहतर तरीके से जानते हैं। फिल्म "रण" (2010) की तरह तो इस फिल्म के विरोध में दिखावे के लिए ही सही पंकज पचौरी की पंचायत नहीं बैठी और न ही आशुतोष(IBN7) का रंज मिजाज खुलकर सामने आया। हां अजीत अंजुम को अपने फैसले पर जरुर अफसोस हुआ कि पहले बिना फिल्म देखे जो उऩ्होंने इसे बनानेवाले को सैल्यूट किया और फाइव स्टार दे दी,अब फेसबुक पर लिखकर भूल सुधार रहे हैं कि-बहुत से सीन जबरन ठूंसे गए हैं , ताकि टीवी चैनलों के प्रति दर्शकों के भीतर जमे गुस्से को भुनाया जा सके . दर्शक मजे भी लें और हाय - हाय भी करें . लेकिन अतिरंजित भी बहुत किया गया है । इन सबके बीच हमें हैरानी हुई एनडीटीवी इंडिया और उसके सुलझे मीडियाकर्मी विजय त्रिवेदी पर जिन्होंने पीपली लाइव को लेकर सैंकड़ों बोलते शब्दों के बीच एक बार भी मीडिया शब्द का नाम नहीं लिया। छ मिनट तो जो हमने देखा उसमें सिर्फ किसान पर बनी फिल्म पीपली लाइव स्लग आता रहा। हमें हैरानी हुई आजतक पर जिसने "सलमान को छुएंगे आमिर,वो हो जाएगा हीरा" नाम से स्पेशल स्टोरी चलायी लेकिन एक बार भी पीपीली लाइव के साथ चैनल शब्द नहीं जोड़ा( गोलमोल तरीके से मीडिया शब्द,वो भी व्ऑइस ओवर में)। न्यूज चैनलों की जब भी आलोचना की जाती है,वो इसमें मीडिया शब्द घुसेड़ देते हैं ताकि उसमें प्रिंट भी शामिल हो जाए और उन पर आलोचना का असर कम हो। ये अलग बात है कि खबर का असर में अपने चैनल का नाम चमकाने में रत्तीभर भी देर नहीं लगाते। इस पूरे मामले में पीपली लाइव फिल्म देखकर न्यूज चैनलों की जो इमेज बनती है वो इस फिल्म की कवरेज को लेकर बननेवाली इमेज से मेल खाती है। ऐसे में फिल्म के भीतर चैनल्स ट्रीटमेंट को पहले से और अधिक विश्वसनीय बनाता है। हमें अजीत अंजुम की तरह जबरदस्ती ठूंसा गया बिल्कुल भी नहीं लगता। हां ये जरुर है कि..
घोषित तौर पर मीडिया को लेकर बनी फिल्म "रण"की तरह पीपली लाइव ने मीडिया पर बनी फिल्म के नाम पर स्टार न्यूज पर दिनभर का मजमा नहीं लगाया, IBN7 को स्टोरी चलाने के लिए नहीं उकसाया, आजतक को घसीटने का मौका नहीं दिया। लेकिन ये रण से कहीं ज्यादा असरदार तरीके से न्यूज चैनलों के रवैये पर उंगली रखती है। रण पर हमारा भरोसा इसलिए भी नहीं जमता कि उसमें चैनलों की आलोचना के वाबजूद तमाम न्यूज चैनलों से एक किस्म की ऑथेंटिसिटी बटोरी जाती है। जिस चैनल संस्कृति की आलोचना फिल्म रण करती है,वही दिन-रात इन चैनलों की गोद का खिलौना बनकर रह जाता है और सबके सब विजय मलिक( अमिताभ बच्चन) के पीछे भागते हैं। नतीजा फिल्म देखे जाने के पहले ही अविश्वसनीय और मजाक लगने लगती है। फिल्म के भीतर की कहानी इस अविश्वास को और मजबूत तो करती ही है,हमें रामगोपाल वर्मा की मीडिया समझ पर संदेह पैदा करने को मजबूर करती है। स्टार न्यूज पर दीपक चौरसिया के साथ टहलते हुए अमिताभ बच्चन भले ही बोल गए हों कि उन्होंने इस फिल्म के लिए चैनल को समझा,लगातार वहां गए लेकिन फिल्म के भीतर वो एक मीडिया प्रैक्टिसनर के बजाय क्लासरुम के मीडिया उपदेशक ज्यादा लगे। चैनल ऑपरेशन को जिसने गोलमोल तरीके से दिखाया गया, विजय मलिक चरित्र को जिस मीडिया देवदूत के तौर पर स्टैब्लिश किया है,ऐसे में ये फिल्म चैनल की संस्कृति की वाजिब आलोचना करने से चूक जाती है। इस लिहाज से कहीं बेहतर फिल्म शोबिज(2007) है जिसकी बहुत ही कम चर्चा हुई।
न्यूज चैनलों को लेकर लोगों के बीच जो बाजिव गुस्सा और अजूबे की दुनिया के तौर पर जो कौतूहल है उस लिहाज से सिनेमा में चैनलों को शामिल किए जाने का ट्रेंड शुरु हो गया है। फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी से लेकर शोबिज,मोहनदास,रण,एलएसडी और अब पीपली लाइव हमारे सामने है। दूसरी तरफ मीडिया पार्टनरशिप के तहत रंग दे बसंती,देवडी,गजनी,फैशन,कार्पोरेट जैसी तमाम फिल्में हैं जिसे देखते हुए सिनेमा के भीतर के न्यूज चैनल्स पर बात की जा सकती है। लेकिन इन सबके बीच एक जरुरी सवाल है कि न्यूज चैनलों के मामले में सिनेमा ऑडिएंस रिएक्शन को,चैनल संस्कृति को और आलोचना के टूल्स को कितनी बारीकी और व्यावहारिक तरीके से पकड़ पाता है? इस स्तर पर पीपली लाइव की न्यूज चैनलों की समझ बाकी फिल्मों से एकदम से अलग करती है।
पीपली लाइव चैनल संस्कृति की आलोचना के लिए किसी चैनल से अपने को ऑथराइज नहीं कराती है। हां ये जरुर है कि फिल्म की जरुरत के लिए एनडीटीवी 24x7 और IBN7 का सहयोग लेती है। ये फिल्म रण की तरह विजय मलिक के इमोशनल स्पीच की बदौलत चैनल के बदल जाने का भरोसा पैदा करने की कोशिश नहीं करती है। न ही रामगोपाल वर्मा की तरह पूरब( रीतेश देशमुख) को खोज लेती है जिसके भीतर एस पी सिंह या प्रणव रॉय की मीडिया समझ फिट करने में आसानी हो। मोहनदास( 2009) का स्ट्रिंगर दिल्ली में आकर चकाचक पत्रकार हो जाता है। लेकिन ये फिल्म ट्रू जर्नलिज्म का उत्तराधिकारी चुनकर हमें देने के बजाय चैनल को कैसे बेहतर किया जाए,ये सवाल ऑडिएंस पर छोड़ देती है। इस फिल्म के मुताबिक नत्था की संभावना शहर में है लेकिन राकेश जैसे पत्रकार की संभावना कहां है,इसका जबाब कहीं नहीं है। फिल्म, ये सवाल चैनल के उन तमाम लोगों पर छोड़ देती है जिन्होंने इसे एस संवेदनशील माध्यम के बजाय चंडूखाना बनाकर छोड़ दिया है। फिल्म को लेकर जिस इन्क्वायरी माइंड की बात हमने की, चैनल को लेकर ये माइंड हमें फिल्म के भीतर राकेश( नवाजउद्दीन) नाम के कैरेक्टर में दिखाई देता है। राकेश( नवाजउद्दीन) नंदिता( मलायका शिनॉय) से जर्नलिज्म को लेकर दो मिनट से भी कम के जो संवाद हैं,अगर उस पर गौर करें तो चैनल इन्डस्ट्री पर बहुत भारी पड़ती है। ये माइंड वहीं पीप्ली में ट्रू जर्नलिज्म करते हुए मर जाता है। ऐसे में ये फिल्म मोहनदास और रण के चैनल्स से ज्यादा खतरनाक मोड़ की तरफ इशारा करती है जहां न तो दिल्लीः संभावना का शहर है और न ही कोई उत्तराधिकारी होने की गुंजाइश है। फिल्म की सबसे बड़ी मजबूती कोई विकल्प के नहीं रहने,दिखाने की है।
कुमार दीपक( विशाल शर्मा) के जरिए हिन्दी चैनल की जमीनी पत्रकारिता के नाम पर जो शक्ल उभरकर सामने आती है,संभव है ये नाम गलत रख दिए गए हों लेकिन चैनल का चरित्र बिल्कुल वही है। अजीत अंजुम जिसे जबरदस्ती का ठूंसा हुआ मान रहे हैं,इस पर तर्क देने के बजाय एक औसत ऑडिएंस को एक न्यूज चैनल के नाम पर क्या और कैसी लाइनें याद आती हैं,इस पर बात हो तो नतीजा कुछ अलग नहीं होगा। नंदिता के चरित्र से जिस एलीट अंग्रेजी चैनलों का चरित्र उभरकर सामने आता है,वो राजदीप सरदेसाई की अपने घर की आलोचना से मेल खाती है। वो बार-बार नत्था के अलावे बाकी लोगों को कैमरे की फ्रेम से बाहर करवाती है। फ्रेम से बाहर किए गए लोग समाज से,खबर से हाशिए पर जाने पर की कथा है। ये अंग्रेजी जर्नलिज्म की सरोकारी पत्रकारिता है। ऐसे में ये बहस भी सिरे से खारिज हो जाती है कि ये महज हिन्दी चैनलों की आलोचना है। हां ये जरुर है कि अंग्रेजी चैनल को ज्यादा तेजतर्रार और अपब्रिंग होते दिखाया गया है। इन सबके वाबजूद जिस किसी को भी ये फिल्म चैनलों की जरुरत से ज्यादा खिंचाई जैसा मामला लग रहा है,उसकी बड़ी वजह है कि इस फिल्म ने चैनलों की पॉपुलिज्म सडांध को बताने के लिए कॉउंटर पॉपुलिज्म मेथड अपनाया। उसने उसी तरह के संवाद रचे,शब्दों का प्रयोग किया,जो कि चैनल खबरों के नाम पर किया करते हैं। चैनल को अपने ही औजारों से आप ही बेपर्द हो जाने का दर्द है।
प्राइवेट न्यूज चैनलों को पिछले कुछ सालों से जो इस बात का गुरुर है कि वो देश चलाते हैं,उनमें सरकार बदलने की ताकत है,वो सब इस फिल्म में ऑपरेट होते दिखाया गया है। कई बार सचमुच पूरी मशीनरी इससे ड्राइव होती नजर आती है लेकिन जब चैनलों की हेडलाइंस खुद सलीम साहब(नसरुद्दीन शाह) की भौंहें के इशारे से बदलती हैं तो फिर खुद चैनल को अपनी सफाई में कुछ कहने के लिए नहीं बचता।
चैनल के लिए गंध मचाना एक मेटाफर की तरह इस्तेमाल होता आया है। लेकिन फिल्म में ये गंध अपने ठेठ अर्थ गंदगी फैलाने के अर्थ में दिखाई देता है। नत्था के पीपली से गायब हो जाने की खबर के बाद से मौत का जो मेला लगा था,वो सब समेटा जाने लगता है। सारे चैनल क्र्यू और उनकी ओबी वैन धूल उड़ाती चल देती है। उसके बाद गांव को लेकर फुटेज है। ये फुटेज करीब 10-12 सेकण्ड तक स्क्रीन पर मौजूद रहती है- चारो तरफ पानी की बोतलें,गंदगी,कचरे। पूरा गांव शहरी संस्कार के कूड़ों से भर जाता है।...फिल्म देखने के ठीक एक दिन पहले मैं नोएडा फिल्म सिटी की मेन गेट के बजाय बैक से इन्ट्री लेता हूं। मुझे वहां का नजारा पीपली लाइव की इस फुटेज से मेल खाती नजर आती है। बल्कि उससे कई गुना ज्यादा जायन्ट। दिल्ली या किसी शहर में जहां हम गंदगी के मामले में किसी को भी ट्रेस करके कह नहीं सकते कि ये गंदगी फैलानेवाले लोग कौन है,नोएडा फिल्म सिटी के इस कचरे की अटारी को देखकर आप बिना कुछ किए उन्हें खोज सकते हैं? बल्कि थोड़ा टाइम दें तो काले कचरे की प्रेत पैकटों को ट्रेस कर सकते हैं कि कौन किस हाउस से आया? इस तरह पूरी की पूरी फिल्म लचर व्यवस्था के लिए जिम्मेदार कौन के सवाल से जूझने और खोजने का नाटक करनेवाले चैनलों को सेल्फ एसेस्मेंट मोड(MODE) की तरफ ले जाती है। अब अगर महमूद फारुकी कहते हैं कि हम फिल्म तो बनाने चले थे किसान पर लेकिन बना ली तो पता चला कि हमने तो मीडिया पर फिल्म बना दी- तो ऐसे में चैनल के लोग इसे एक ईमानदार स्टेटमेंट मानकर ऑडिएंस को भरमाने की जगह किसान के बजाय मीडिया एनलिसिस नजरिए से फिल्म को देखना शुरु करें तो शायद इस फर्क को समझ पाएं कि होरी महतो के मर जाने और नत्था के मरने की संभावना के बीच भी कई खबरें हैं,कई पेचीदगियां हैं।
फिल्म पीपीली लाइव के इस शो में इन्टर्वल के दौरान पीवीआर साकेत के पर्दे पर लुई फिलिप,बिसलरी और अल्सायी हुई लड़की के साथ पल्सर के विज्ञापन नहीं आते हैं।..और न ही एक तरफ फुफकारती हुई डंसने पर आमादा नागिन और दूसरी तरफ सुर्ख लाल पानी से भरी बोतल जिसे दिखाकर सरकार हमारे बीच चुनने के टेंशन पैदा करना चाहती है। म्यूजिक बंद करने की अपील के साथ पर्दे के आगे मंच पर माइक लिए हमारे सामने होते हैं महमूद फारुकी और दानिश हुसैन। वो हमें जो वजह बता रहे होते हैं जिससे जेब में पड़ी पूरी टिकट के वाबजूद आधी फिल्म निकल गयी थी। हमने जो समझा वो साफ तौर पर ये कि मीडिया की आलोचना और उसे कोसने की एक परंपरा तो विकसित हो चली है लेकिन डिस्ट्रीव्यूशन के निर्मम खेल की तरफ लोगों का ध्यान नहीं गया है। इस पर बात किया जाना जरुरी है,महमूद हैं तो अब बात क्या पूरी फिल्म बनायी जा सकती है,जैसी डिमांड रख सकते हैं। हम सिनेमा और मीडिया के कंटेंट में ही फंसे हैं जबकि डिस्ट्रीव्यूशन कैसे कंटेंट और एडीटोरियल के आगे बेशर्मी से दांत निपोरने लग जाता है,इसे हमने महसूस किया। बहरहाल,
महमूद और दानिश फिल्म के छूट गए हिस्से को जिस तरह से बता रहे थे,वो फिल्म देखने से रत्तीभर भी कम दिलचस्प नहीं था। दोनों के लिए एक लाइन- अब तो फिलम भी बना दी लेकिन दास्तानगोई की आदत बरकरार है,सही है हजूर। उनके ऐसा करने से हम पहली बार पीवीआर में होमली फील करते हैं,एकबारगी चारों तरफ नजरें घुमाई तो दर्जनों परिचित पत्रकार,सराय के साथी,डीयू और जेएनयू के सेमिनार दोस्त दिख गए। आप सोचिए न कि पीवीआर में दो शख्स जिसमें एक बिना माइक के ऑडिएंस से बातें कर रहा हो और किसी के खांसने तक कि आवाज न हो,कैसा लगेगा? लौंडों के अठ्ठहास करने,पीवीआर इज वेसिकली फॉर कपल के अघोषित एजेंडे, एक-दूसरे की उंगलियों में उंगलियां फंसाकर जिंदगी सबसे मजबूत गांठ तैयार करने की जगह अगर ये सिनेमा पर बात करने की जगह बन जाती है तो कैसा लग रहा होगा? सच पूछिए तो महमूद से लगातार मेलबाजी करके इसी किसी अलग "इक्सक्लूसिव" अनुभव की लालच में पड़कर मैं और मिहिर मार-काट मचाए जा रहे थे। एक तो अपनी लाइफ में ये पहली फिल्म रही जिसकी टिकट खुद बनानेवाला नाम पुकारकर भाग-भागकर दे रहा था और हमारी बेशर्मी तब सारी हदें पार कर जाती है जब हम अपनी आंखें सिर्फ महमूद पर टिकाए हैं कि देख रहें हैं न हमें,हम भी हैं। हमें अनुराग कश्यप के साथ बहसतलब की पूरी सीन याद आ गयी,जहां अनुराग सिनेमा जिस राह पर चल पड़ा है,बदल नहीं सकता। ये राह लागत की नहीं डिस्ट्रीव्यूशन की है,की बात करते हैं। फिर सारी बहस इस पर कि सिनेमा समाज को बदल सकता है कि नहीं? पीपली लाइव देखने के दौरान जो नजारा हमने देखा उससे ये बात शिद्दत से महसूस की कि समाज का तो पता नहीं लेकिन कुछ जुनूनी लोग धीमी ही सही अपने जज्बातों को, ड्रीम प्लान को आंच देते रहें तो सिनेमा को तो जरुर बदल सकते हैं। इन सबके बीच अनुषा रिजवी( फिल्म की डायरेक्टर) बहुत ही कूल अंदाज में पेप्सी के साथ चिल्ल हो रहीं होती हैं। महमूद के मेल के हिसाब से सचमुच ये फैमिली शो था, अनुभव के स्तर पर सचमुच एक पारिवारिक आयोजन। लोग घर बनाने पर दिखाते हैं,बच्चे पैदा होने पर बुलाते हैं। उऩ्होंने फिल्म बनाने पर हम सबको बुलाया था।
इन्टर्वल के बाद फिल्म शुरु से पहले दोनों ने हमें जो कुछ बताया और जो बातें हमें याद रह गयी उसमें तीन बातें बहुत जरुरी है। पहली तो ये कि नत्था के आत्महत्या करने की योजना के बीच उनके बच्चों पर जिस किस्म के दबाब बनते हैं वो दबाब कम्युनिस्ट परिवार में पैदा होनेवाले बच्चे ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। दूसरा कि शुरुआत में तो ये फिल्म हम किसान-समस्या पर बनाने चले थे लेकिन मैं और अनुषा चूंकि मीडिया बैग्ग्राउंड से हैं तो फिल्म बनने पर पता चला कि अरे हमने तो मीडिया पर फिल्म बना दी। फिर हमें दिलाया गया वो भरोसा कि अगर आप इस फिल्म में मीडिया ट्रीटमेंट देखना चाहते हैं तो असल कहानी अभी ही शुरु होनी है। मतलब कि मैं जिस नीयत से फिल्म देखने गया था,उसकी पूरी होने की गारंटी मिल गयी।..औऱ तीसरी और सबसे जरुरी बात डिस्ट्रीव्यूशन और मल्टीप्लेक्स के बीच का कुछ-कुछ..।( ये महमूद के शब्द नहीं है,बस भाव हैं)। ये कुछ-कुछ जिसके भीतर बहुत सारे झोल हैं जिसका नाम लेते ही धुरंधर लिक्खाड़ों की कलम गैराजों में चली जाती है और जुबान मौसम का हाल बयान करने लग जाते हैं। इन्टर्वल के बाद फिल्म शुरु होती है..
नत्था के घर के आजू-बाजू मीडिया,चैनल क्र्यू का जमावड़ा। आप पीपली लाइव से इन सारे 6-7 मिनट की फुटेज को अलग कर दें और सारे चैनलों को उसकी एक-एक कॉपी भेज दें। आजमा कर देखा जाए कि उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है? और हां इस क्रम में रामगोपाल वर्मा के पास एक सीडी जानी बेहद जरुरी है जिससे कि वो समझ सकें कि मीडिया की आलोचना भाषणदार स्क्रिप्ट के दम पर नहीं उसके ऑपरेशनल एटीट्यूड को बस हमारे सामने रख देनेभर से हो जाती है। इस अर्थ में ये फिल्म किसी डायरेक्टर या प्रोड्यूसर से कहीं ज्यादा एक ऐसे "इन्क्वायरिंग माइंड' की फिल्म है जो सीधे तौर पर सवाल करता है कि क्यों दिखाते रहते हो ये सब? अकेले नत्था थोड़े ही आत्महत्या करेगा,करने जा रहा है..जो कर चुके उसका क्या? यही पर आकर फिल्म चैनल की पॉपुलिज्म संस्कृति से प्रोटीन-विटामिन निचोड़कर काउंटर पॉपुलिज्म के फार्मूले को मजबूती से पकड़ती है और नतीजा हमारे सामने है कि आज हर तीन में से दो शख्स फोन करके,चैट पर,फेसबुक स्टेटस पर यही सवाल कर रहा है कि आपने पीपली लाइव देख ली क्या? महमूद फारुकी ने हमसे दो-तीन बार कह दिया कि जब तक आप इस फिल्म को पूरी न देख लें,तब तक इस पर न लिखें। इसलिए फिल्म पर अलग से..
फिल्म खत्म होती है और हम धीरे-धीरे एग्जिट की तरफ खिसकते हैं। अनुषा,महमूद,दानिश सबके सब तैनात हैं लोगों से मिलने के लिए। एक-एक से हाथ मिलाना,गले मिलना और विदा करना। हमसे हाथ मिलाते हुए फिर एक बार-फिल्म अगली सुबह देखकर ही लिखना,ऐसे मत लिख देना।
तेज बारिश के बीच मेट्रो की सीट पर धप्प से गिरने के बाद सामने एक मुस्कराहट। चेहरा जाना-पहचाना। थोड़ी यादों की बार्निश से सबकुछ अपडेट हो जाता है। वो कहते हैं- क्या फिल्म बना दी पीपली लाइव, क्या नत्था की जो समस्या है,वही आखिरी समस्या है एक किसान की? न्यूज चैनलों की आलोचना कर रहे हो तो बताओ न यार कि हम क्या करें? मालिक कहता है कि रिवन्यू जेनरेट करो तो हम क्या करें? फिर बीबीसी की पत्रकारिता को आहें भरकर याद करते हैं, जहां हैं वहां के प्रति अफसोस जाहिर करते हैं।...देखो न मेरे दिमाग में एक आइडिया है, आमिर को बार-बार फोन कर रहा हूं,काट दे रहा है? ओह..एक चैनल के इनपुट हेड का दर्द,वो भी आज ही के दिन मेरे हिस्से आना था। महमूद साहब,ये आपने क्या कर दिया कि जिस टीवी चैनल के इनपुट हेड ने हमें खबर के नाम पर बताशे बनाने और आइडियाज को चूल्हे में झोंक देने की नसीहतें दिया करते थे, वो भी आइडियाज ग्रस्त हो गए? आप और अनुषा टीवी में आइडियाज क्यों ठूंसना चाहते हैं? सबके सब आइडियाज के फेर में ही पड़ जाएंगे तो फिर बताशे कौन बनाएंगे?
देर रात लैप्पी स्क्रीन पर लौटने पर सौरभ द्विवेदी की फेसबुक स्टेटस पर नजर गयी। लिखा था- पीपली लाइव जरूर देखिए, प्रेमचंद की कहानी कफन जैसा ट्रैजिक सटायर है ये फिल्म, सिर्फ एक बात के सिवा, इसमें अनुषा रिजवी ने अपने एनडीटीवी संस्कारों के तले दबकर दीपक चौरसिया सर नुमा कैरेक्टर के बहाने हिंदी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कुछ ज्यादा ही खिंचाई की है। फिल्म का अंत खासा मानीखेज है। सौरभ अपने दीपक सर नुमा कैरक्टर के बहाने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खिंचाई से थोड़े आहत हैं और एनडीटीवी का संस्कार थोड़ा परेशान करता है। काश,ये संस्कार खुद एनडीटीवी में ही बचा रह जाए और संस्कार में दबकर ही कुछ और कर जाए। आधी फिल्म और जींस की जेब में पड़ी पूरी टिकट के गुरुर में पूरी की पूरी पोस्ट लिखी जा सकती है लेकिन मिहिर देर रात जागा हुआ है, पोस्ट लिखने के बजाय ट्विटर से मन बहला रहा है, महमूद के प्रति मैं खिलाफत करना नहीं चाहता।..तो एक बार फिर पीपली लाइव समग्र देखने की तैयारी में...
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महमूद और दानिश फिल्म के छूट गए हिस्से को जिस तरह से बता रहे थे,वो फिल्म देखने से रत्तीभर भी कम दिलचस्प नहीं था। दोनों के लिए एक लाइन- अब तो फिलम भी बना दी लेकिन दास्तानगोई की आदत बरकरार है,सही है हजूर। उनके ऐसा करने से हम पहली बार पीवीआर में होमली फील करते हैं,एकबारगी चारों तरफ नजरें घुमाई तो दर्जनों परिचित पत्रकार,सराय के साथी,डीयू और जेएनयू के सेमिनार दोस्त दिख गए। आप सोचिए न कि पीवीआर में दो शख्स जिसमें एक बिना माइक के ऑडिएंस से बातें कर रहा हो और किसी के खांसने तक कि आवाज न हो,कैसा लगेगा? लौंडों के अठ्ठहास करने,पीवीआर इज वेसिकली फॉर कपल के अघोषित एजेंडे, एक-दूसरे की उंगलियों में उंगलियां फंसाकर जिंदगी सबसे मजबूत गांठ तैयार करने की जगह अगर ये सिनेमा पर बात करने की जगह बन जाती है तो कैसा लग रहा होगा? सच पूछिए तो महमूद से लगातार मेलबाजी करके इसी किसी अलग "इक्सक्लूसिव" अनुभव की लालच में पड़कर मैं और मिहिर मार-काट मचाए जा रहे थे। एक तो अपनी लाइफ में ये पहली फिल्म रही जिसकी टिकट खुद बनानेवाला नाम पुकारकर भाग-भागकर दे रहा था और हमारी बेशर्मी तब सारी हदें पार कर जाती है जब हम अपनी आंखें सिर्फ महमूद पर टिकाए हैं कि देख रहें हैं न हमें,हम भी हैं। हमें अनुराग कश्यप के साथ बहसतलब की पूरी सीन याद आ गयी,जहां अनुराग सिनेमा जिस राह पर चल पड़ा है,बदल नहीं सकता। ये राह लागत की नहीं डिस्ट्रीव्यूशन की है,की बात करते हैं। फिर सारी बहस इस पर कि सिनेमा समाज को बदल सकता है कि नहीं? पीपली लाइव देखने के दौरान जो नजारा हमने देखा उससे ये बात शिद्दत से महसूस की कि समाज का तो पता नहीं लेकिन कुछ जुनूनी लोग धीमी ही सही अपने जज्बातों को, ड्रीम प्लान को आंच देते रहें तो सिनेमा को तो जरुर बदल सकते हैं। इन सबके बीच अनुषा रिजवी( फिल्म की डायरेक्टर) बहुत ही कूल अंदाज में पेप्सी के साथ चिल्ल हो रहीं होती हैं। महमूद के मेल के हिसाब से सचमुच ये फैमिली शो था, अनुभव के स्तर पर सचमुच एक पारिवारिक आयोजन। लोग घर बनाने पर दिखाते हैं,बच्चे पैदा होने पर बुलाते हैं। उऩ्होंने फिल्म बनाने पर हम सबको बुलाया था।
इन्टर्वल के बाद फिल्म शुरु से पहले दोनों ने हमें जो कुछ बताया और जो बातें हमें याद रह गयी उसमें तीन बातें बहुत जरुरी है। पहली तो ये कि नत्था के आत्महत्या करने की योजना के बीच उनके बच्चों पर जिस किस्म के दबाब बनते हैं वो दबाब कम्युनिस्ट परिवार में पैदा होनेवाले बच्चे ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। दूसरा कि शुरुआत में तो ये फिल्म हम किसान-समस्या पर बनाने चले थे लेकिन मैं और अनुषा चूंकि मीडिया बैग्ग्राउंड से हैं तो फिल्म बनने पर पता चला कि अरे हमने तो मीडिया पर फिल्म बना दी। फिर हमें दिलाया गया वो भरोसा कि अगर आप इस फिल्म में मीडिया ट्रीटमेंट देखना चाहते हैं तो असल कहानी अभी ही शुरु होनी है। मतलब कि मैं जिस नीयत से फिल्म देखने गया था,उसकी पूरी होने की गारंटी मिल गयी।..औऱ तीसरी और सबसे जरुरी बात डिस्ट्रीव्यूशन और मल्टीप्लेक्स के बीच का कुछ-कुछ..।( ये महमूद के शब्द नहीं है,बस भाव हैं)। ये कुछ-कुछ जिसके भीतर बहुत सारे झोल हैं जिसका नाम लेते ही धुरंधर लिक्खाड़ों की कलम गैराजों में चली जाती है और जुबान मौसम का हाल बयान करने लग जाते हैं। इन्टर्वल के बाद फिल्म शुरु होती है..
नत्था के घर के आजू-बाजू मीडिया,चैनल क्र्यू का जमावड़ा। आप पीपली लाइव से इन सारे 6-7 मिनट की फुटेज को अलग कर दें और सारे चैनलों को उसकी एक-एक कॉपी भेज दें। आजमा कर देखा जाए कि उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है? और हां इस क्रम में रामगोपाल वर्मा के पास एक सीडी जानी बेहद जरुरी है जिससे कि वो समझ सकें कि मीडिया की आलोचना भाषणदार स्क्रिप्ट के दम पर नहीं उसके ऑपरेशनल एटीट्यूड को बस हमारे सामने रख देनेभर से हो जाती है। इस अर्थ में ये फिल्म किसी डायरेक्टर या प्रोड्यूसर से कहीं ज्यादा एक ऐसे "इन्क्वायरिंग माइंड' की फिल्म है जो सीधे तौर पर सवाल करता है कि क्यों दिखाते रहते हो ये सब? अकेले नत्था थोड़े ही आत्महत्या करेगा,करने जा रहा है..जो कर चुके उसका क्या? यही पर आकर फिल्म चैनल की पॉपुलिज्म संस्कृति से प्रोटीन-विटामिन निचोड़कर काउंटर पॉपुलिज्म के फार्मूले को मजबूती से पकड़ती है और नतीजा हमारे सामने है कि आज हर तीन में से दो शख्स फोन करके,चैट पर,फेसबुक स्टेटस पर यही सवाल कर रहा है कि आपने पीपली लाइव देख ली क्या? महमूद फारुकी ने हमसे दो-तीन बार कह दिया कि जब तक आप इस फिल्म को पूरी न देख लें,तब तक इस पर न लिखें। इसलिए फिल्म पर अलग से..
फिल्म खत्म होती है और हम धीरे-धीरे एग्जिट की तरफ खिसकते हैं। अनुषा,महमूद,दानिश सबके सब तैनात हैं लोगों से मिलने के लिए। एक-एक से हाथ मिलाना,गले मिलना और विदा करना। हमसे हाथ मिलाते हुए फिर एक बार-फिल्म अगली सुबह देखकर ही लिखना,ऐसे मत लिख देना।
तेज बारिश के बीच मेट्रो की सीट पर धप्प से गिरने के बाद सामने एक मुस्कराहट। चेहरा जाना-पहचाना। थोड़ी यादों की बार्निश से सबकुछ अपडेट हो जाता है। वो कहते हैं- क्या फिल्म बना दी पीपली लाइव, क्या नत्था की जो समस्या है,वही आखिरी समस्या है एक किसान की? न्यूज चैनलों की आलोचना कर रहे हो तो बताओ न यार कि हम क्या करें? मालिक कहता है कि रिवन्यू जेनरेट करो तो हम क्या करें? फिर बीबीसी की पत्रकारिता को आहें भरकर याद करते हैं, जहां हैं वहां के प्रति अफसोस जाहिर करते हैं।...देखो न मेरे दिमाग में एक आइडिया है, आमिर को बार-बार फोन कर रहा हूं,काट दे रहा है? ओह..एक चैनल के इनपुट हेड का दर्द,वो भी आज ही के दिन मेरे हिस्से आना था। महमूद साहब,ये आपने क्या कर दिया कि जिस टीवी चैनल के इनपुट हेड ने हमें खबर के नाम पर बताशे बनाने और आइडियाज को चूल्हे में झोंक देने की नसीहतें दिया करते थे, वो भी आइडियाज ग्रस्त हो गए? आप और अनुषा टीवी में आइडियाज क्यों ठूंसना चाहते हैं? सबके सब आइडियाज के फेर में ही पड़ जाएंगे तो फिर बताशे कौन बनाएंगे?
देर रात लैप्पी स्क्रीन पर लौटने पर सौरभ द्विवेदी की फेसबुक स्टेटस पर नजर गयी। लिखा था- पीपली लाइव जरूर देखिए, प्रेमचंद की कहानी कफन जैसा ट्रैजिक सटायर है ये फिल्म, सिर्फ एक बात के सिवा, इसमें अनुषा रिजवी ने अपने एनडीटीवी संस्कारों के तले दबकर दीपक चौरसिया सर नुमा कैरेक्टर के बहाने हिंदी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कुछ ज्यादा ही खिंचाई की है। फिल्म का अंत खासा मानीखेज है। सौरभ अपने दीपक सर नुमा कैरक्टर के बहाने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खिंचाई से थोड़े आहत हैं और एनडीटीवी का संस्कार थोड़ा परेशान करता है। काश,ये संस्कार खुद एनडीटीवी में ही बचा रह जाए और संस्कार में दबकर ही कुछ और कर जाए। आधी फिल्म और जींस की जेब में पड़ी पूरी टिकट के गुरुर में पूरी की पूरी पोस्ट लिखी जा सकती है लेकिन मिहिर देर रात जागा हुआ है, पोस्ट लिखने के बजाय ट्विटर से मन बहला रहा है, महमूद के प्रति मैं खिलाफत करना नहीं चाहता।..तो एक बार फिर पीपली लाइव समग्र देखने की तैयारी में...
विभूति छिनाल प्रसंग में सुधीर सुमन की ओर से फोन पर अविनाश को धमकी देने के बाद से मैंने तय कर लिया कि मुझे इस बहस से अपने को अलग कर लेना है। इस प्रसंग में नामवर सिंह की चुप्पी मुझे लगातार हैरान कर रही थी इसलिए इस पर लिखना जरूरी समझा और मोहल्ला लाइव पर लिखा। अशोक वाजपेयी ने जनसत्ता में उस बात को आज उठाया है। सुधीर सुमन ने जिस तरह से अविनाश को फोन करके धमकाया, जिसे लिखने के बाद फिर जिस तरह के कमेंट आने शुरू हुए, उसे देखते हुए मुझे अपनी तरफ की एक कहावत याद आयी – भइया से पार न पाये तो भौजी को पछाड़े। हालांकि ये कहावत अपने आप में स्त्री-विरोधी है लेकिन स्त्री को जैसा कि पितृसत्तात्मक समाज पुरुष से कमजोर और लाचार मानता आया है, (इस मुहावरे को स्त्री विरोधी मानते हुए) उस अर्थ में हुआ ये कि जब विभूति नारायण को लेकर खुलकर विरोध करने की बात आयी, राज्य की हिंसा का खुलेआम समर्थन करने पर अगले दिन देश के किसी भी हिंदी बुद्धिजीवी ने अखबार में लेख या वर्चुअल स्पेस पर पोस्ट लिखकर विरोध नहीं जताया लेकिन जब बेशर्मी से राठौर के अंदाज में हंटर साहब ने माफी मांग ली तो एक-एक करके तथाकथित महान, प्रतिबद्ध और पार्टीलाइन को ब्रह्म वाक्य माननेवाले लेखक उनके विरोध में जुटने लगे। वो विरोध भी हंटर साहब से कहीं ज्यादा इस तीन-चार दिन के प्रकरण में जो हंटर साहब के आजू-बाजू मुद्दे और विरोध में लोग आये थे, उनकी बात को कुचलने के लिए लोग जमा हुए।
इस क्रम में सुधीर सुमन ने अविनाश को भोपाल प्रसंग की याद दिलायी, दो-तीन बेनामी दम-खम के साथ मैदान में उतरे और एक-दूसरे पर लगे कीचड़ उछालने। इस बीच जानकीपुल पर स्थापित नाम हस्ताक्षर अभियान में शामिल होते रहे। सुधीर सुमन की भाषा में जो तल्खी अविनाश को हड़काते हुए दिखी, हम इंतजार ही करते रहे कि वो भाषा हंटर साहब के विरोध में भी उठते। मैंने तब सुधीर सुमन को संबोधित करते हुए कमेंट किया कि सुधीरजी, आपको जो कहना है कहिए, लिखिए… बस इतनी अपील है कि यहां मसला विभूति नारायण राय की बेशर्मी और उसके लिए इस्तीफे की मांग है, न कि अविनाश, आप मुद्दे को डायवर्ट मत कीजिए। हमें लगा कि अब लोगों के लिए ये मुद्दा स्त्री सम्मान की खुलेआम धज्जियां उड़ाने, उसकी भर्त्सना करने और दंडित करने के बजाय एक-दूसरे को पॉलिटिकली करेक्ट और इनकरेक्ट साबित करने का हो गया है। ये बचपन की उस हरकत की याद दिलाती है जब हममें से कोई गू मख जाता (गू पर पैर पड़ जाना) तो बाकी बच्चे हमें चिढ़ाएं, हमें अपने समुदाय से अलग कर दें, हम तत्काल दो-तीन को छू देते, फिर वो किसी और को। … और इस तरह कोई भी कंचन नहीं बचता, सबमें गू मखने का बोध पैदा हो जाता और चुप मार जाते। यहां भी उसी शैली में जिस बात का विरोध किया जाना चाहिए, वो धीरे-धीरे गायब होने लग गया है। वैसे भी हिंदी समाज में, जिसमें कि मैं खुद भी शामिल हूं, तात्कालिकता को बहुत ही ओछी चीज मानते हैं।
हिंदी समाज अतीत के भारी-भरकम बोझ को फिर भी उठाने को तैयार रहता है, भविष्य के लिए फिर भी जतन से खाई, पहाड़ सब खोदने को तैयार रहता है लेकिन तात्कालिक मामलों से अपने को दूर रखता है। मैं सोचता हूं कि जितनी बातें अब अखबारों में बुद्धिजीवियों की जुबानी आ रही है, वही बात जब गिनती की महिला लेखिकाओं के कपिल सिब्बल से मिलने वक्त आतीं तो कुछ अलग किस्म का असर होता। उन पर विचारधारा का मुलम्मा न चढ़ता, अपने हित के गुणा-गणित की चिंता से मुक्त होकर लिखा जाता तो हिंदी समाज की जीवंतता खुलकर सामने आने पाती। बहरहाल, मैं इस मसले पर चुप हो गया, सुधीर सुमन वाली पोस्ट में लिखा भी कि सब अपनी-अपनी चमकाने में लगे हैं, मुद्दे से किसी को कोई लेना-देना नहीं है। बीच-बीच में विभूति-छिनाल प्रसंग की उत्तर कथा नाम से एक पोस्ट लिखने की हुलस उठती-बैठती रही… मोहल्ला पर झांकना उसी तरह जारी रहा, जिस तरह से एक जवान लौंडा दिनभर में चार से पांच बार अपनी जुल्फी और दाढ़ी की बढ़ती साइज निहारने के लिए आईने देखा करता है।
मैं मोहल्ला लाइव का कट्टर पाठक/लेखक हूं, एक-एक चीजें नजर से होकर गुजरती है, ये जानते हुए भी अविनाश ने देर रात मुझे एक कमेंट फारवर्ड किया – विनीत कुमार का फैन said: मोहल्ला के नियमित लेखक विनीत कुमार इस मुद्दे पर कुछ नहीं लिख रहे हैं! नामवर सिंह जैसे अप्रासंगिक वृद्ध और संन्यास ले चुके आलोचक के ऊपर प्रवचन के अतिरिक्त उन्होंने कुछ नहीं लिखा। उनकी तलवार की धार जैसी तीखी भाषा में एक लेख इस मुद्दे पर आना ही चाहिए। किसी भी पाप्युलर इश्यु पर उनका राय न देना खटकता है। उनके नियमित पाठक के रूप में हमें उनके स्टैंड का इंतजार रहता है। उम्मीद है, विनीत कुमार जल्द ही अपने पाठकों के सामने हमेशा की तरह बोल्ड एंड ब्यूटीफुल तेवर में सामने आएंगे। उम्मीद है उनकी कलम रवींद्र कालिया के पास गिरवी नहीं पड़ी होगी।
कमेंट पढ़कर एकबारगी तो जोर से हंसी आयी! सबसे ज्यादा इस पर कि हाय, मेरा मासूम पाठक नामवर सिंह को वृद्ध और संन्यास ले चुका मानता है। अपनी जानकारी बढ़ाये और पता करे कि बाबा अभी भी कहां-कहां जमे हुए हैं? फिर अविनाश की नीयत के बारे में सोचा कि ये हमें फिल्म रिलीज होने के पहले ही (पीपली लाइव) नत्था की शक्ल में देखना चाहते हैं, जो अपने आप ही घोषित करे कि वो आत्महत्या करना चाहता है। फिर मैं एक तमाशे में तब्दील हो जाऊं। मैं बेनामियों को भी अपनी ही तरह हांड़-मांस का इंसान मानता हूं। आप खुद ही इन लाइनों को पढ़िए न बेनामी – इस कमेंट पर कौन न मर जाए? जिससे कोई पाठक इस कदर मोहब्बत करता है, उसे और क्या चाहिए? उसके हाथ चूमने को जी करता है। उसके आगे राष्ट्रपति सम्मान, गोयनका अवार्ड, आइटीए अवार्ड सब मद्धिम और कसैले पड़ जाते हैं। ये जानते हुए कि बेबाक और तत्काल लिखने के अपने खतरे हैं, लिखना जरूरी है। जिसे भी अपने प्रकाशकों से रॉयल्टी, कमेटियों से टोकन मनी के बजाय पाठकों का प्यार पाना है, उसे हर हाल में ऐसा लिखना होगा। मेरे प्रिय पाठक, मैं मन से, विचार से, विश्वास से आपका प्यार चुनता हूं। मुझे अहं न होते हुए भी भरोसा है कि अगर मेरे लिखने में कुछ बात होगी तो मेरा लेखन किसी भी पत्रिका, संपादक या व्यक्ति का मोहताज नहीं होगा। आप हम पर वही भइया से पार न पाये तो भौजी को पछाड़ें वाला फार्मूला लागू करना चाहते हैं तो कोई बात नहीं।
ऐसे समय में मुझे पता नहीं कि हंटर साहब के साथ क्या होगा, कालियाजी को बने रहना चाहिए या जाना चाहिए, लोग तय करें – लेकिन हां, एक अदने से ब्लॉगर का मनोबल जरूर बढ़ा है, उसकी कसमें और मजबूत हुई हैं कि वो जमाने के चलन से अलग हटकर पाठक का प्यार चुनेगा, लेखन को कभी भी सरसराकर आगे बढ़ने और लोहा-लक्कड़ (जिसे दुनिया समृद्धि कहती है) जुटाने का जरिया नहीं बनाएगा।
लेकिन मेरे पाठक, तुमसे एक शिकायत जरूर रहेगी कि तुमने अपने जिस ब्लॉग लेखक पर भरोसा किया, उसी के दामन में दाग खोजने की कोशिश की। सोचो न, तुमने लिखा कि उम्मीद है कि विनीतजी की कलम कालियाजी के पास गिरवी नहीं पड़ी होगी। अब तुम ही बताओ न, पच्चीस-पचास की कलम होती तो गिरवी रख भी दी होती। लेकिन पचास हजार रुपये का लैपटॉप (इसमें अलग से कीबोर्ड की कीमत पता नहीं – इसलिए पूरा दाम लिखा) भला कालियाजी के यहां गिरवी कैसे रख दूं? जिसे मैंने बड़े जतन से खरीदा, जिसके कागज को कोर्ट में जमानत के मामले में नहीं जाने दिया, उसे मैं कालियाजी के पास धूल खाने के लिए कैसे रख दूं? आपने जिस लेखक की मंशा और भरोसे पर शक किया, उससे ये कैसी मोहब्बत है कि चाहते हो वो कालियाजी के खिलाफ खुलकर सामने आये और उसका आगे से उस पत्रिका में लिखना बंद हो जाए? मुझे हैरानी होती है कि तुम्हारा कलेजा कितना कमजोर है? तुम हमसे मजे लेने के मूड में हो शायद। लेकिन यकीन करो कि किसी पत्रिका में छपने, नहीं छपने से कोई लेखक नहीं मर जाता है। मैं पांचजन्य और रामसंदेश जैसी पत्रिकाओं को छोड़कर कहीं भी छपूंगा।
लेखक मरता है, अपनी विश्वसनीयता के खत्म हो जाने से, पाठकों के बीच सेटर कहलाने से, जुगाड़ी वाली छवि बन जाने से। मुझे अगर ऐसे होकर लेखक घोषित होना औऱ भीतर से मर जाना होता तो मैं डेढ़-दो फीट की लंबी पोस्ट आये दिन लिखने के बजाय, छपवाने की जुगाड़ में लग जाता। संभव है, तुम मेरी इस भावुकता पर ठहाके लगा रहे होगे कि लपेट लिया न। लेकिन लगाओ ठहाके, मैं इसे अपनी नीयत सार्वजनिक करने का एक बहुत ही सूफीयाना मौका मानता हूं। तुम मुझे लगातार पढ़ते हो तो ये भी पढ़ा होगा कि – हंस की संगोष्ठी से लौटने के बाद जहां हंटर साहब, आलोक मेहता का मामला गप्प, भसोड़ी और मसखरई में तब्दील में होने को थी, बाकी वेबपोर्टल के संपादकों की तरह तुम्हारा लेखक भी आधी रात तक जागा रहा, कुछ उनलोगों के प्रतिरोध में लिखा, नया ज्ञानोदय में हंटर साहब के “छिनाल” शब्द पर सवाल खड़े किये। लिटरेचर के तौर पर सबसे पहले किया, तब तो तुम्हारे हाथों में पत्रिका शायद आयी भी नहीं होगी। ये सब लिखते वक्त उसकी उंगलियां सही-सही कीबोर्ड पर जा रही थी, कांप नहीं रही थी क्योंकि ये पहला मौका नहीं था जब उसे कुछ लिखने पर गंवाना पड़ता। वो वर्धा का टुकड़ा जिसे कि लोग हंटर साहब के हरम का सुख कहते हैं, ठुकरा चुका है। इसके पहले वो एक विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम तैयार करने का आनंद त्याग चुका है। इसके पहले वो हिंदी के बाबाओं के सान्निध्य सुख से वंचित (अच्छा ही लगा) हो चुका है। तुम मुझे नाहक ही अपने को महान साबित करवाने पर तुले हुए हो।
मैं, बाकी लोगों की तरह आज भी और भविष्य में भी हंटर साहब, रवींद्र कालिया की संपादन नीति, चमकानेवाले बुद्धिजीवी जमात के प्रति प्रतिरोध में खड़ा हूं, रहूंगा। संभव है कि तुम्हें ये प्रतिरोध कई बार साफ दिखाई न दे। ऐसा इसलिए कि कई नामचीन लोगों की आक्रामक चौंधियायी चमक के आगे तुम्हें इस लेखक की मौजूदगी दिखाई न देती है। संभव हो, हो-हल्ला और हुड़दंगी शैली के प्रतिरोध के बीच ये लेखक नदारद मिले। लेकिन वो हमेशा प्रतिरोध में खड़ा रहेगा, पोटैटो एक्टिविस्ट बनकर नहीं, कीबोर्ड पर बिना थरथरानेवाली उंगलियों को लेकर। जो सवाल तुमने खड़े किये जो कि मेरे लिए एक घिनौनी गाली ही है, वही सवाल कभी प्रखर युवा आलोचक रंगनाथ सिंह ने भी उठाये थे। मेरी पीठ पर राजेंद्र यादव का नाम चस्पां कर दिया था। पोस्ट लिखने के बाद शाम को फोन करके पूछा था कि आप हंस में नहीं लिखते क्या? उसे इस बात का अफसोस हुआ था कि बिना वहां छपे ही उसने मेरे ऊपर लेबल चस्पांये थे। मैंने तब भी कहा था कि मेरी पीठ को एमसीडी की दीवार मत बनाओ। आज फिर कहता हूं, हम जो प्रयोग कर रहे हैं, जो कोशिशें कर रहे हैं, वो आपसे ही मजबूत होनी है। जिस दिन इस लेखक ds कीबोर्ड से चारण लाइन लिखा जाने लगेगा, वो लिखना बंद कर देगा… अपनी उंगलियों को न तो नाड़े की तरह हिलने देगा और न ही किसी के नापाक विचारों की काई को अपने ऊपर जमने देगा।
अभी हम ये बात सोच ही रहे थे कि अभी तक न्यूज चैनल के एंकर्स कॉमनवेल्थ के शेरु का छापावाली टीशर्ट पहनकर एंकरिंग क्यों नहीं कर रहे कि देखता हूं वो टीशर्ट पहनने के बजाय कॉमनवेल्थ की बाट लगाने में जुट गए। एंकरों को टीशर्ट में देखने की उम्मीद इसलिए कि अब ये एक चलन-सा बन गया है। न्यूज24 ने तो कभी आइपीएल की सभी टीमों की ड्रेस पहनाकर अपने एंकरों की लाइन लगा दी थी स्क्रीन पर। आइपीएल का बिग शो नाम दिया था तब,बिग बॉस और आइपीएल की कॉकटेल परोसी थी जो कि हमें रास न आयी थी। कॉमनवेल्थ को लेकर होनेवाले घोटाले की कहानी साठ दिन बाकी रहने के दिन से शुरु हुई। इसके पहले अधिकांश चैनल आकाओं की बाइट,उनकी प्रसन्न मुद्रा और इस खेल के जरिए इंडियननेस पैदा करने के काम में जुटे रहे। बीच-बीच में जो कहानी दिखाई-बताई भी तो वो भी सिर्फ अधूरी तैयारियों को लेकर,गड़बड़ियों को लेकर नहीं। ऐसे में, आज सारे चैनलों पर कॉमनवेल्थ को लेकर जो घोटाले दिखाए जा रहे हैं वो न तो इन खबरों की फॉलोअप है और न ही उसके पीछे लगातार लगे रहने के कारण कोई खोजी किस्म की पत्रकारिता के तहत इन घोटालों का खुलासा हो पाया। चैनलों पर जिस तरह की खबरें आ रही हैं,उसे देखते हुए मुझे कहीं से भी नहीं लगता कि चैनल के लोग कभी इस तरह के घोटाले को लेकर स्टोरी करने की बात सोच रहे होंगे। वो क्या सोच रहे होंगे,इसकी चर्चा आगे। फिलहाल,
अब जबकि चैनलों ने इस घोटाले को लेकर लगातार खबरें चलानी शुरु की जिसमें कि बारीकियों के बजाय कुछ लोगों को टांग देने भर का मूड ज्यादा है, हिन्दी मीडिया के वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार और इस साल गोयनका अवार्ड से सम्मानित अजीत अंजुम न्यूज चैनलों के इस काम पर लट्टू हुए जा रहे हैं। उनके लिए इस घोटाले की खबर का दिखाया जाना उन उदाहरणों में से है जिसे लहराकर हमारे बीच किल्ला ठोंक दावे कर सकते हैं कि देखो तुमलोग न्यूज चैनलों को कोसते फिरते हो,कितना बड़ा काम कर रहा है ये। इसी मुग्धता की चपेट में आकर उन्होंने फेसबुक के वॉल पर लिखा-
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अब जबकि चैनलों ने इस घोटाले को लेकर लगातार खबरें चलानी शुरु की जिसमें कि बारीकियों के बजाय कुछ लोगों को टांग देने भर का मूड ज्यादा है, हिन्दी मीडिया के वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार और इस साल गोयनका अवार्ड से सम्मानित अजीत अंजुम न्यूज चैनलों के इस काम पर लट्टू हुए जा रहे हैं। उनके लिए इस घोटाले की खबर का दिखाया जाना उन उदाहरणों में से है जिसे लहराकर हमारे बीच किल्ला ठोंक दावे कर सकते हैं कि देखो तुमलोग न्यूज चैनलों को कोसते फिरते हो,कितना बड़ा काम कर रहा है ये। इसी मुग्धता की चपेट में आकर उन्होंने फेसबुक के वॉल पर लिखा-
टीवी चैनल और अखबार कलमाड़ी एंड कंपनी के काले कारनामों और घोटालों का लगातार खुलासा कर रहे हैं . मीडिया को गैरजिम्मेदार मानकर दिन रात कोसने वालों आलोचकों और निंदकों को कम से कम इस मामले में मीडिया की तारीफ करनी ही चाहिए . मीडिया इस मामले में अपना काम कर रहा है अगर सरकार भी करने लगे तो गेम्स खत्म होते होते कलमाड़ी एंड कंपनी को सलाखों के पीछे भी जाना पड़ सकता है . क्या लूट मचा रखी है इन सबने..
अजीत अंजुम इससे पहले भी मीडिया और न्यूज चैनलों के पक्ष में अपनी वॉल पर लिखते आए हैं। उनके ऐसा लिखने के पीछे न्यूज चैनलों का पक्ष लेने से कहीं ज्यादा मीडिया आलोचकों को उकसाना और उनकी औकात बताने की नीयत ज्यादा रही है। अगर ऐसा नहीं होता तो वो जरुर न्यूज चैनलों के पक्ष में जो बात लिखते हैं उसका मजबूत आधार होता। उकसाने की उऩकी इस आदत को हम कई बार मारकर बर्दाश्त कर लेते लेकिन अबकी बार जो उन्होंने कॉमनवेल्थ घोटाले को दिखाए जाने पर न्यूज चैनलों को अपनी तरह से क्रांतिकारी होने का बिल्ला बांटने लगे तो हमेशा रहा नहीं गया। हमने फेसबुक पर इसका जबाब देना जरुरी समझा। जो जबाब हमने वहां दिया,उसकी स्क्रीन शॉट तस्वीर की शक्ल में यहां लगा दे रहा हूं। लेकिन पूरी बात थोड़ा और विस्तार देकर रखना जरुरी है।
अजीत अंजुम जिस बिना पर न्यूज चैनलों पर लट्टू हुए जा रहे हैं उसके जबाब में एक ऐसी ऑडिएंस जो लगातार टेलीविजन तो देखती है लेकिन भीतर के खेल तक उसकी पहुंच नहीं है, वो भी यही कहेगा कि- रहने दीजिए,हमारी अक्ल घास चरने नहीं गयी है। सौदा पटा नहीं तो घोटाले की खबर दिखाने लग गए, नहीं तो अभी शेरु के छापेवाली टीशर्ट पहनकर एंकर तो एंकर चैनल के सारे रिपोटर्स पीटीसी देते नजर आते। क्या घोटाला कोई एख दिन में हुआ है। इतने-इतने प्रेस कॉन्फ्रेंस हुए,कॉमनवेल्थ की मसाल को लेकर जो कार्यक्रम आयोजित हुए,उन सब में से किसी के दौरान कुछ गड़बड़ होने की भनक आपको नहीं मिली। पूरी दिल्ली इस खेल के नाम पर खोद दी गयी,जो टाइल्स तीन महीने पहले लगे थे,उसे दोबारा और उससे कहीं ज्यादा घटिया लगाए गए। मैंने खुद अपनी आंखों से देखा कि डीयू कैंपस में जो डिवाइडर दोपहर को लगाए हैं,शाम तक धाराशायी हो गए। एफएम चैनलों ने बार-बार बताया कि रॉ मटीरियल बड़े पैमाने पर लोग अपने घरों में ले जा रहे हैं। जितने पत्थर सड़कों पर काम के लिए गिराए गए वो सबके सब चाय-समोसे की रेड़यों के आगे बैठने के काम आने लगे। ये कोई एक दिन का घोटाला नहीं है, इसके पीछे लंबी और शुरु से कहानी है। कभी किसी चैनल ने पता करने की कोशिश की कि जो भी कन्सट्रक्शन चल रहे हैं,उसकी एक्सपेक्टेड लागत और जो लगे हैं उसके बीच कितना का फर्क है। वो साठ दिन पहले तक सिर्फ अधूरे काम,कब पूरे होंगे पर स्टोरी करते रहे। ये एक सॉफ्ट स्टोरी बनकर रह गयी।
अजीत अंजुम जिस बिना पर न्यूज चैनलों पर लट्टू हुए जा रहे हैं उसके जबाब में एक ऐसी ऑडिएंस जो लगातार टेलीविजन तो देखती है लेकिन भीतर के खेल तक उसकी पहुंच नहीं है, वो भी यही कहेगा कि- रहने दीजिए,हमारी अक्ल घास चरने नहीं गयी है। सौदा पटा नहीं तो घोटाले की खबर दिखाने लग गए, नहीं तो अभी शेरु के छापेवाली टीशर्ट पहनकर एंकर तो एंकर चैनल के सारे रिपोटर्स पीटीसी देते नजर आते। क्या घोटाला कोई एख दिन में हुआ है। इतने-इतने प्रेस कॉन्फ्रेंस हुए,कॉमनवेल्थ की मसाल को लेकर जो कार्यक्रम आयोजित हुए,उन सब में से किसी के दौरान कुछ गड़बड़ होने की भनक आपको नहीं मिली। पूरी दिल्ली इस खेल के नाम पर खोद दी गयी,जो टाइल्स तीन महीने पहले लगे थे,उसे दोबारा और उससे कहीं ज्यादा घटिया लगाए गए। मैंने खुद अपनी आंखों से देखा कि डीयू कैंपस में जो डिवाइडर दोपहर को लगाए हैं,शाम तक धाराशायी हो गए। एफएम चैनलों ने बार-बार बताया कि रॉ मटीरियल बड़े पैमाने पर लोग अपने घरों में ले जा रहे हैं। जितने पत्थर सड़कों पर काम के लिए गिराए गए वो सबके सब चाय-समोसे की रेड़यों के आगे बैठने के काम आने लगे। ये कोई एक दिन का घोटाला नहीं है, इसके पीछे लंबी और शुरु से कहानी है। कभी किसी चैनल ने पता करने की कोशिश की कि जो भी कन्सट्रक्शन चल रहे हैं,उसकी एक्सपेक्टेड लागत और जो लगे हैं उसके बीच कितना का फर्क है। वो साठ दिन पहले तक सिर्फ अधूरे काम,कब पूरे होंगे पर स्टोरी करते रहे। ये एक सॉफ्ट स्टोरी बनकर रह गयी।
न्यूज चैनलों के भीतर वाकई सरोकार है( मैं इसे मौके-मौके पर उमड़ आनेवाली चीज मानता हूं) तो उसका काम सिर्फ घोटाले की खबर को हम तक लाना नहीं है। उसका काम घोटाले के अंदेशे से भी हमें अवगत कराना है। अगर उऩ्हें लगता है कि वो घोटाले की खबर दिखाकर कोई बहुत बड़े सरोकार का काम कर रहे हैं। उऩके ऐसे घोटाले की खबर दिखाए जाने से भविष्य में ऐसे घोटालों पर लगाम कसे जा सकेंगे तो माफ कीजिएगा ऐसे घोटाले सीरियल और आरुषि हत्याकांड की खबर जैसा मजा तो दे सकते हैं जिनमें सस्पेंस और थ्रिलर एलीमेंट होते हैं,लेकिन इन खबरों से घोटालों पर लगाम नहीं लगेगा,न अभी न कभी भी। क्योंकि एक तो इन घोटालों मे तथ्यों की अनदेखी करके जल्दी से जल्दी इसे एक रोचक धारावाहिक कथा में बदल देने की चैनलों की छटपटाहट होती है और दूसरा गदहे के सिर से सिंघ गायब हो जाने की पुरानी आदत इसके असर को खत्म कर देती है। अजीतजी,आप बता सकते हैं कि संसद में नोटो की जो गड्डियां लहाराई गयी थी और अपने सबसे काबिल टीवी पत्रकार ने हमसे कहा था कि हमारे पास इसके पीछे की पूरी कहानी की सीडी है,हम इसे फिलहाल देशहित में रख रहे हैं,ब्रॉडकास्ट नहीं कर रहे,उस सीडी का क्या हुआ? वो किस मरघट में स्वाहा कर दी गयी। अजीतजी आप बता सकते हैं कि अगर चैनल सचमुच इतना सरोकार रखते हैं तो सबसे करप्ट रीयल स्टेट दुनिया की खबर, पानी के पीछे माफिया की खबर, एफसीआई के भीतर भयंकर गड़बड़ियों की खबर,वीपीओ में हिला देनेवाली करप्शन, मल्टीनेशनल कंपनियों के दलालों की खबर हम तक क्यों नहीं पहुंचाते? आखिर ऐसा क्यों है कि जो राजदीप सरदेसाई,शायद आप भी ये मानते हैं कि अब दिनभर प्रधानमंत्री और राजनेताओं के चेहरे ही टेलीविजन स्क्रीन की खबर बने,जरुरी नहीं। इसे टीआरपी के लिहाज से भी अलग कर देते हैं, जब अपने को सरोकार से जुड़ा होनेवाला साबित करना हो तो इन्हीं नेताओं को कटघरे में शामिल करके क्रांति का बिल्ला बांटने-लगाने लग जाते हैं। आखिर सरोकारी पत्रकारिता सिर्फ राजनीतिक खबरों के बीच से ही क्यों पनपती है? क्या बाकी के सेक्टर में कोई गड़बड़ियां नहीं है,क्या उसमें करप्शन नहीं है,क्या वो खबर नहीं है? ऐसा इसलिए कि आपलोगों को राजनीतिक लोगों की बाट लगाने के बाद भी उन्हें मैनेज करने का पुराना अभ्यास है, उनकी बत्ती लगाकर भी कल को आप उन्हें मैनेज कर लेंगे लेकिन कार्पोरेट की बत्ती लगाकर बाद में साधने की कला अभी आपने सीखी नहीं। एक बार हाथ से गया सो गया। फ्यूचर में सीख लें तो शायद वहां के घोटाले की भी खबर देने लग जाए। सब है,तब आप टीआरपी की दुहाई देंगे,लोग किसान,भूखमरी की बातें नहीं देखना चाहते। हमें हैरानी होती है कि जब हम वाकई सरोकारी खबरों की बात करते हैं तब आप टीआरपी की दुहाई देने लग जाते हैं और जब हम न्यूज चैनलों की स्टोरी को स्ट्रैटजी मानते हैं तो उसे आप सरोकारी पत्रकारिता का लेबल चस्पाने लग जाते हैं।
सच्चाई आप भी जानते हैं,टुकड़ो-टुकड़ों में कुछ-कुछ हम भी कि लालाओं के पैसे से एक का माल दो किया जा सकता है,दो का चार,एक सरोकार से जुड़ा संवेदनशील समाज नहीं। दिलीप मंडल दो मंचों से ये कह भी चुके हैं कि जिन मीडिया संस्थानों में करोड़ों रुपये लगे हों,वहां के मालिक जब बोर्ड की मीटिंग में बैठते हैं तो आपको क्या लगता है कि मूल्य,सरोकार,नैतिकता,जागरुकता की बात करते होंगे? राजदीप ने तो उदयन शर्मा की संगोष्ठी में लगभग समर्पण ही कर दिया कि हम विज्ञापन और कंपनियों के आगे विवश हैं। संपादकों में न बोलने की ताकत नहीं रह गयी। अब आप अकेले इस किस्म की पत्रकारिता को सरोकारी पत्रकारिता का नाम दे रहे हैं तो आगे क्या कहें? सच बात तो ये है कि ऑडिएंस ने अब आपलोगों से इस तरह की उम्मीद और मांग करना छोड़ दिया है। वो मानकर चलने लगी है कि ये एक किस्म का धंधा है। आपसे अपील है कि इस तरह की बातें करके उन्हें कन्फ्यूज न करें।
अब देखिए- इस घोटाले की उत्तर कथा क्या होगी? ये महज मेरा अनुमान है. जिस खेल के पीछे शीला दीक्षित और उनकी टीम ने महीनों लगाया उसे वो चैनलों के हाथ का झुनझुना कभी नहीं बनने देगी। अभी दो-चार दिन और बजा लेने दीजिए। जब उऩका मन भर जाएगा,भीतर के सारे विकार बाहर आ जाएंगे ( इसे अरस्तू ने काथार्सिस( विरेचन) कहा था) तब नए सिरे से फ्रेश मूड में आक्रमक तरीके से कॉमनवेल्थ फेवर का काम होगा। तब सारे चैनलों को कुछ-कुछ टुकड़े फेंक दिए जाएंगे। चैनल के भीतर जो अभी सरोकारी पत्रकारिता का गूलकोज-पानी चढ़ा है,उसके बदले सरकार का चढ़ेगा। वो कॉमनवेल्थ के पक्ष में खड़े होते जाएंगे।
अजीतजी, लेकिन आप चिंता बिल्कुल न करें। आपके न्यूज चैनलों के पत्रकार तब भी सरोकारी पत्रकार ही कहलाएंगे। आपने जो उन्हें क्रांतिकारी पत्रकार के बिल्ले बांटे हैं,उनकी भी तो इज्जत रखनी है। आखिर खबर का असर वाला चालू फार्मूला किस दिन काम आएगा? सारे चैनलों पर लिखा आएगा- खबर का असर, शीला सरकार आयी हरकत में,कॉमनवेल्त से सारी गड़बड़ियों का सफाया,अब कहीं कोई खोट नहीं। ऐतिहासिक होगा कॉमनवेल्थ, शीला की अपील- देशहित में दें हमारा साथ।..चैनल की तरफ से अपील- आपने हमें घोटाले के वक्त देखा,अब देखिए जब हम इस खेल से घोटाले को जड़ से खत्म कर दिया। खबर का असर- सुधर गया सबकुछ, न्यूज इज बैक,खबर हर कीमत पर,दिल में सच,जुबां पे इंडिया।..देखते रहिए.







