टीआरपी को मीडिया इन्डस्ट्री का अंतिम सत्य माननेवाले कमर वहीद नकवी साहब सहित आजतक टीम की हालत इन दिनों इसी टीआरपी ने पस्त कर रखी है। वो लगातार इसी टीआरपी से पिछले चार सप्ताह से भी ज्यादा से लहुलूहान होते आए हैं। इस बीच चैनल नें अपने को नंबर वन पर लाने के लिए तमाम तरह के हथकंड़े अपनाए और दुनियाभर के हाथ-पैर मारे। इसी छटपटाहट में उसने  एक तरफ अपने को इंडिया टीवी के संस्कार में ढालने की कोशिश की तो दूसरी तरफ ऑपरेशन हे राम के जरिए अपने पुराने तेवर में भी लौटने का प्रयास किया। आजतक की ये कोशिश उसकी बेचैनी को साफ बयान कर देती है कि वो अपनी इस हालात को लेकर कितना कनफ्यूज है? वो इस बात को तय ही नहीं कर पा रहा है कि ऑडिएंस उसके इंडिया टीवी बन जाने से ज्यादा जुट पाएंगे या फिर पुराने आजतक की शक्ल में लौटने पर? हमारी जैसी ऑडिएंस भी इसके इंडिया टीवी की शक्ल में आने पर घबराने लग गयी कि बस एक ही उल्लू काफी है,बर्बाद ए गुलिस्ता करने को,हर साख पे उल्लू बैठा है,अंजाम ए गुलिस्ता क्या होगा वाला मामला होता जा रहा है तो फिर न्यूज कल्चर का आगे क्या हाल होगा?
 लेकिन इसी ऑडिएंस ने ऑपरेशन हे राम देखकर मन ही मन शुभकामना भी जाहिर किया और आगे चलकर फेसबुक पर लिखा कि- आजतक की ऑपरेशन हे राम के जरिए देश के अय्याश और दलाल बाबाओं पर की गयी स्टोरी जबरदस्त है। इस स्टोरी के जरिए उसे इस सप्ताह अच्छी टीआरपी मिलेगी। इस स्टोरी को पहले हमने टेलीविजन पर देखा और जो हिस्से छूट गए उसे उसकी ऑफिशियल साइट पर अपलोड किए गए वीडियो के जरिए देखा। ये और बाद है कि चैनल ने इसे बाद में स्टिंग से ज्यादा रायता में तब्दील कर दिया और अगले दिन भी फैलाता रहा। स्टोरी देखने के बाद हम उम्मीद कर रहे थे कि अगले दिन तक हंगामा मच जाएगा। देशभर में आग लग जाएगी,दंगे की शक्ल में देश जल उठेगा। इस देश में जहां हर पीपल का पेड़ अपनी पैदाइश के साथ एक मंदिर का भविष्य लेकर आता है और एक बेरोजगार के बाबा हो जाने की गारंटी देता है वहां आसाराम बापू,सुधांशु महाराज,महाकाल और दाती महाराज जैसे महंत को बेनकाब कर देने से स्थिति सामान्य नहीं रह जाएगी। वैसे भी हमने आज तक के कम से कम आधे दर्जन स्टिंग ऑपरेशन के असर को तो देखा ही है जिससे पूरा देश हिल गया है। हम अगले पांच घंटे और अगले दिन तक चैनल के 6-8 विंडो में कटकर देशभर की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और ये स्टिंग हवा में उड़ गया। बासी स्टिंग ऑपरेशन ने कुछ असर नहीं किया।

ये वो नाजुक मौका है जिस पर आजतक को सीरियसली सोचना चाहिए कि आखिर क्यों उसके इस स्टिंग ऑपरेशन को लोगों ने पाद धरकर उड़ा दिया,उस पर गौर नहीं किया, हंगामा क्यों नहीं बचा। ये सबसे बड़ा चिन्ह है जो ये बताता है कि आजतक की ब्रांडिंग और उसकी विश्वसनीयता झरझराकर गिर गयी है। इस पर सिर्फ एडीटोरियल की टीम को ही नहीं,बल्कि मार्केटिंग के लोगों को भी लगना होगा। पैकेज पर काम करने के साथ ही ब्रांड वैल्यू और रीस्टैब्लिशमेंट पर भी ध्यान देना होगा।
बहरहाल आजतक खबरों और कंटेंट के स्तर पर जहां रद्दोबदल कर रहा है जिसे हम उसका कन्फ्यूज्ड हो जाना कह रहे हैं,वही लोगों की जिम्मेदारी तय करने में भी भारी फेरबदल कर रहा है। चैनल की भाषा में कहें तो वो वास्तुशास्त्र के हिसाब अपने चैनल को दुरुस्त करने में जुटा है। संभव है उसे साढ़े साती की चपेट में आने का भान हो रहा है। वास्तुशास्त्र के हिसाब से दो स्तर के बदलाव होते हैं। एक तो ये कि जो भीतरी स्ट्रक्चर है,उसमें ही फेरबदल कर दिया जाय- जैसे जो बेडरुम है,उसे बाथरुम बना दिया जाए और जो बेडरुम है उसमें एक चापानल या लोहे की कोई चीज जड़ दी जाए। मतलब जहां लिखा है प्यार,वहां लिख दो सड़क टाइप से बदलाव जिसका खूबसूरती और यूटिलिटी से तो कोई मतलब न हो बल्कि कबाड़ा ही हो लेकिन वास्तुशास्त्र के लिहाज से ये जरुरी है। चैनल ने फिलहाल ये बदलाव भीतरी स्ट्रक्चर के हिसाब से ही किया है।

सबसे बड़ा बदलाव कि अजय कुमार जो कि अबतक आजतक के आउटपुट हेड हुआ करते थे,उन्हें अब रिपोर्टिंग के हिस्से से जुड़े होंगे बोलकर झूलता छोड़ दिया गया है,आगे का पद क्या होगा,अभी तय नहीं है जबकि कमान अभी अशोक सिंघल के ही हाथ रहेगी। ये अजय कुमार के कद को कतरकर छोटा करने का काम हुआ। इसका साफ मतलब है कि अजय कुमार पर से आजतक का भरोसा उठ गया। इनके बारे में चंद जरुरी लाइनें आगे।..फिलहाल,शैलेन्द्र झा जो कि तेज के हेड हुआ करते थे अब उन्हें अजय कुमार की जगह आजतक का आउटपुट हेड बना दिया गया है जबकि स्पोर्टस कवर करती आयी पूनम शर्मा को तेज का हेड बना दिया गया है। लोगों को ये बदलाव संभव हो कि बहुत ही अटपटा लग रहा हो लेकिन अगर वास्तुशास्त्र का यही उचित विधान है तो इस अटपटेपन का क्या कीजिएगा? संभव हो कि अजय कुमार इस अल्टरेशन को आनेवाले समय में चलते-चलते मेरे ये गीत,याद रखना के सीन के तौर पर ले रहे हों तो वहीं शैलेन्द्र झा और पूनम शर्मा को इस प्रोमोशन से अपने भीतर छिपी प्रतिभा, आंचल में बंधे तो भी चंदन,आग में जले तो भी चंदन जैसी लग रही हो। लेकिन
 एन्टीएन्क्रीमेंट के माहौल में उनका ये प्रोमोशन बाकी लोगों को कितनी रास आएगी,चैनल के भीतर के माहौल के लिहाज से ये भी एक बड़ा सवाल है। अभी चैनल के भीतर भारी अफरा-तफरी मची हुई है। लोगों पर गहरी नजर रखी जा रही है और तय किया जा रहा है कि ये बंदा/बंदी शक्ल से ही लग रहा/रही है कि टीआरपी मजबूत करने के काम आएगा,इसे प्रोमोट करो।..न न ये तो अजय कुमार की ही कार्बन कॉपी है,इसे थोड़ा ऑल्टर करो। ऐसे माहौल में एक तो एंटीइन्क्रीमेंट और दूसरा कि कद छोटा किए जाने,हालत यही रही तो शैक कर दिए जाने के डर के बीच टीआरपी कितनी बढ़ेगी,ये चैनल के भीतर आतंकवाद से भी बड़ी समस्या है। लेकिन अगर ये सारे बदलाव टोटके के तौर पर आजमाए जा रहे हैं तो समझिए कि चैनल नें मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर एक नए खेल को जन्म दिया है- आओ खेलें कोना-कोनी बदलने का खेल।

भीतरी स्ट्रक्चर में हेर-फेर करने पर अगर चैनल को वास्तुशास्त्र का लाभ न मिला तो संभव है कि गणपति बप्पा विसर्जन और मां दुर्गा की स्थापना के बीच तक आजतक के भीतर किसी बड़े बाबा की प्राण प्रतिष्ठापना हो जाए। इसे लेकर फिजा में स्टार न्यूज से इम्पोर्ट करने की खबर भी है जो कि कभी यहीं से एक्सपोर्ट हुए।.
अब अजय कुमार को लेकर कुछ छूट गयी लाइनें।..आजतक में इन्क्रीमेंट के सवाल को लेकर जब मैंने लिखा कि आजतक में कई नत्था लालबहादुर के भरोसे जी रहे हैं तो हमें एक पुराने मीडियाकर्मी ने अजय कुमार की प्रोफाइल को लेकर विस्तार से जानकारी दी। उसमें उन्होंने बताया कि वो सिविल सर्विसेज बैग्ग्राउंज से आते हैं,उन्होंने सिविल सर्विसेज के लिए आइआएएम लखनउ की अधूरी पढ़ाई छोड़ दी। फिर जर्नलिज्म के लिए सिविल सर्विसेज को बाय कर दिया। उनका ऐसा बताने में संभव है कि ये समझाने का आग्रह रहा हो कि चैनल ने अजय कुमार के महत्व को समझा ही नहीं। लेकिन सवाल तो ये भी है कि अजय कुमार ने आइआइएम और सिविल सर्विसेज के अनुभव से क्या सीखा? मोहल्लालाइव पर नागार्जुअन ने अपनी कालजयी पोस्ट में अजय कुमार की क्षमता का अतिरेक में ही सही लेकिन आकलन कर दिया है। एंकरिंग करने के दौरान भी मैंने कई बार महसूस किया है कि अजय कुमार जिस अंदाज में ज्ञान देने की मुद्रा में आते हैं,वो चैनल की ट्रेनिंग न होकर इन्हीं प्रोफेशन की ट्रेनिंग है जिसे कि डेप्थ के नाम की ब्रांडिंग की जाती है जो आजतक जैसे चैनल के किसी काम की नहीं है। हां, ऑपरेशन हे राम में बेहतर अदकारा साबित हुए। फिर हमें दूसरे सूत्रों से जानकारी  मिली कि वो टीटीएम कला( ताबड़तोड़ तेल मालिश) में भी निपुण रहे हैं जो कि चैनल कल्चर के लिए योग्यता से ज्यादा जरुरी चीज है बल्कि ये भी योग्यता ही है। फिर ये टोटका उन्हीं के साथ क्यों लागू किया गया? हमें फिर वही कहावत याद आती है- झाड-फूंक में सबसे बेशकीमती चीज ही तो चढ़ायी जाती है न बबुआ।..
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इस तरह टुकड़ों-टुकड़ों में,अलग-अलग जगहों पर हिन्दी को मरी हुई क्यों करार देते हैं? हिन्दी के विकास के नाम पर ऐश करने का काम जब सामूहिक तौर पर होता आया है तो उसके नाम की मर्सिया पढ़ने का काम क्यों न सामूहिक हो? इस प्रोजोक्ट में बेहतर हो कि एक नीयत जगह पर उसके नाम का मकबरा बनाया जाए जहां 14 सितंबर के नाम पर लोग आकर अपनी-अपनी पद्धति से मातम मनाने,कैंडिल जलाने का काम करें। कोशिश ये रहे कि इसे अयोध्या-बाबरी मस्जिद की तरह सांप्रदायिक मामला न बनाकर मातम मनाने की सामूहिक जगह के तौर पर पहचान दिलाने की कोशिश हो। वैसे भी पूजा या इबादत की जगह सांप्रदियक करार दी जा सकती है, मातम मनाने के लिए इसे सांप्रदायिक रंग-रोगन देने की क्या जरुरत? बेहतर होगा कि इसे कबीर की तरह अपने-अपने हिस्से का पक्ष नोचकर मंदिर या मस्जिदों में घुसा लेने के बजाय खुला छोड़ दिया जाए। देश में कोई तो एक जगह हो जो कि शोक के लिए ही सही सेकुलर( प्रैक्टिस के स्तर पर ये भी अपने-आप में विवादास्पद अवधारणा है लेकिन संवैधानिक है इसलिए) करार दी जाए। बस मूल भावना ये रहे कि ये जगह उन तमाम लोगों के लिए उतनी ही निजी है जितनी कि किसी के सगे-संबंधी के गुजर जाने पर उसके कमरे की चौखट,तिपाई,चश्मा,घाघरा जिसे पकड़कर वो लगातार रोते हैं।

 जिनके लिए हिन्दी बाजार के हाथों लगातार कुचली जाकर,पूंजीवाद के माध्यम से छली जाकर और अब इंटरनेट के दंगाइयों के संसर्ग में आकर अधमरी या पूरी तरह मर गयी है,उन्हें इसके विकास का राग अलपाने और जर्जर कोशिश करने के बजाय इसकी मौत की विधि-आयोजनों में शामिल हो जाना चाहिए। हिन्दी दिवस के नाम पर जबरदस्ती के उत्सवधर्मी रंगों के बैनर टांगकर अंदर सेमिनार हॉलों में टेसू बहाने से अच्छा है कि वे घर बैठकर सादगी से मातम मनाने का काम करें। कुछ नहीं तो कम से कम सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये तो बचेंगे। बाकी जिन्हें लगता है कि हिन्दी का लगातार विस्तार हो रहा है,वो ऐसी बातें सेमिनार और आयोजनों के बूते ऐसा नहीं कह रहे बल्कि वो अपने-अपने व्यक्तिगत स्तर पर ऐसा लगातार कर रहे हैं। हमारी अपील बस इतनी भर है कि जिन्हें हिन्दी मरती हुई नजर आती है,खासकर सालभर में केवल एक सप्ताह तक,जो पेशेवर तौर पर छाती पिटनेवाले लोग हैं,उन्हें इसे बेहतर करने के प्रयास आज से ही छोड़ देने चाहिए। वेवजह में हर साल उम्मीदों का पखाना छिरियाते हैं और अगले साल तक जिसकी बदबू अकादमियों में बजबजायी रहती है,जिसे ठोस रुप देने के लिए लाखों के खर्चे होते हैं।

कुछ साल तक हिन्दी जिस हाल में है,उसे उसी हाल में छोड़कर देखिए,व्यक्तिगत स्तर पर जो लोग जैसा कर रहे हैं केवल उन्हें ऐसा करने की छूट दे दें,फिर देखिए कि हिन्दी को चील-कौए खाते हैं या फिर हिन्दी सद्यस्नात: स्त्री( तुरंत नहाकर बाथरुम से निकली हुई) की तरह खिलकर हमारे सामने आती है।

मेरी अपनी समझ है कि हिन्दी की सेहत अव्वल तो पहले से बेहतर हुई है,पहले जो रघुवीर सहाय की दुहाजू बीबी हुआ करती थी,अब ज्यादा स्लीम ट्रीम हुई है। अब अगर ये अनमैरिड है तब तो सौन्दर्य के सैंकड़ों पैमाने उस पर अप्लाय कर दें लेकिन विवाहित भी है तो उसका रुप उन विवाहित स्त्रियों की तरह है जो रियलिटी शो के  फैशन शो या डांस कॉम्पटीशन में शामिल होने के लिए कुलांचे भर रही है। जिस बाजार की हिन्दी समाज के अधिकांश आलोचक पानी पी-पीकर गरिआते हैं,उसी बाजार ने इसे एक प्रोफेशनल एटीट्यूड दिया है। अब वो अपने दम पर अपनी पेट भरने की हैसियत में आने लगी है। अब वो संस्थानों के पराश्रित नहीं है। आप चाहें तो हिन्दी की इस बदलती हालत पर स्त्री विमर्श के डॉमेस्टिक लेवर और मार्केट लेवर कॉमडिटी के तहत विश्लेषित कर हिन्दी की सेवाभावना को एक ठोस मनी वैल्यू निकाल सकते हैं। घरेलू हिंसा और सांस्थानिक जबरदस्ती से स्त्रियों के मुक्त होने की तरह ही आज की हिन्दी को समझ सकते हैं।

वर्चुअल स्पेस के जिन बलवाइयों से हिन्दी के गिद्ध-जड़ आलोचकों को खतरा है,उन वलवाइयों के पास इतनी तमीज तो जरुर है कि जिस हिन्दी के साथ वो खाते-पीते,डेटिंग करते हैं,उसे हमराज मानते हैं,उसकी लुक्स को फिट रखे। वर्चुअल स्पेस के वलवाईयों ने हिन्दी को इसी रुप में विस्तार दिया है जो कि ग्लोबल स्तर पर जाकर भी मैं हिन्दी हूं कहकर शान से अपना परिचय दे सकें। फिलहाल मैं इस बहस में बिल्कुल नहीं पड़ना चाहता कि ऐसा करते हुए इन लोगों ने वर्तनी,शिल्प,संरचना और शब्दों के स्तर पर कितना कबाड़ा किया है,सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि आज अगर हिन्दी दबी जुबान में बोलनेवाली भाषा एक हद तक नहीं रह गयी है( इसे ज्यादा मजबूती से कहना ज्यादती होगी) जिसकी क्रेडिट खुद हिन्दी के गिद्ध-सिद्ध आलोचक भी लेने में नहीं चूकते तो इसमें इनलोगों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संभव है कि इस स्पेस पर लिखनेवाले लोगों ने अज्ञेय की तरह प्रतीक और बिंब न गढ़े हों,मुक्तिबोध की तरह कोई सभ्यता-समीक्षा न प्रस्तावित की हो, निराला की तरह छंदों को नहीं साधा हो लेकिन मौजूदा परिवेश में उसने हिन्दी के भीतर जितनी कॉन्फीडेंस पैदा की है,उस पर गंभीरता से बात करने की जरुरत है। तो भी..

जिस किसी को हिन्दी भ्रष्ट होती हुई,छिजती हुई नजर आती है तो यकीन मानिए उसकी ये हालत सबसे ज्यादा उन्हीं लोगों के हाथों हुई है जिनके उपर इसे सेहतमंद रखने का जिम्मा डाला गया या फिर उन्होंने रोजी-रोटी के चक्कर में ये जिम्मेदारी अपने आप ले ली। अभी सप्ताह भर भी नहीं हुए कि राजभाषा समिति की रिपोर्ट अंग्रेजी में आने पर भारी हंगामा मचा। पिछले साल इस समिति से संबंद्ध पी.चिदमबरम के अंग्रेजी में भाषण दिए जाने पर छीछालेदर हुई। हिन्दी को बेहतर बनानेवाले पहरुओं ने इसे एक सहज भाषा के तौर पर विस्तार देने के बजाय इसे अपने कुचक्रों से एक अंतहीन समस्या के तौर पर तब्दील कर दिया। अगर किसी राजनीतिक विश्लेषक के आगे आतंकवाद,कश्मीर जैसी समस्याएं,तमाम प्रशासनिक सक्रियताओं के वावजूद एक अंतहीन समस्या जैसी जान पड़ती है तो भाषा पर बात करनेवालों के लिए हिन्दी की समस्या कुछ इसी तरह है। हिन्दी के पहरुओं ने इसका बंटाधार क्रमशः दो स्तरों पर किया है। एक तो ये कि उन्होंने एक जड़ समझ विकसित कर ली है कि हिन्दी का मतलब अधिक से अधिक तत्सम शब्दों का प्रयोग है.अंग्रेजी शब्दों का हिन्दी अनुवाद है और दूसरा कि ये एक ऐसी भाषा है जिसका काम अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं को ठिकाने लगाने का है। इन पहरुओं ने ये काम शब्दकोश बनाने,प्रशासनिकों कामों में हिन्दी प्रयोग करने,दिशा-निर्देश जारी करने से लेकर अनुवाद करने तक में किया है। नतीजा ये हुआ कि जिस हिन्दी को सबसे सहज भाषा बननी चाहिए वो लोगों से दूर होती चली गयी और बाबुओं की भाषा बनकर रह गयी। इसका एक सिरा इस रुप में विकसित हुआ कि हिन्दी का ये रुप मजाक उड़ाने और इससे तौबा कर लेने के तौर पर स्थापित होता चला गया। टेलीविजन चैनलों पर ऐसी हिन्दी को लेकर वकायदा लॉफ्टर शो आने लगे हैं। दूसरा कि

निबटाने वाली भाषा के तौर पर शक्ल देने की वजह से ये आपसी मतभेदों को और अधिक उजागर करता रहा। इस बीच बोलचाल,बाजार,मनोरंजन,माध्यमों के बीच हिन्दी जिस रुप में विकसित होती रही उसे हिन्दी के सरकारी पहरुओं और आलोचकों ने सीरियसली नहीं लिया। वे सिर्फ हिन्दी के बीच से अंग्रेजी के शब्द बीन-बीनकर फेंकने में ही लगे रहे जबकि सवाल हिन्दी के बीच अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं के शब्दों का आना नहीं है,उन शब्दों के प्रयोग की स्वाभाविकता को लेकर है। अप्रतलित हिन्दी शब्दों का जबरिया इस्तेमाल और पॉपुलर हिन्दी शब्दों की जगह वेवजह अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग इसी राजनीति की शिकार हुई है। इसलिए.

जरुरी है कि हर साल हिन्दी दिवस के नाम पर सप्ताहभर पहले से मंत्रालयों औऱ तमाम सरकारी दफ्तरों के आगे उत्सवधर्मी रंगों के बैनर टांगने और अंदर जाकर मर्सिया पढ़ने का जो काम चला आ रहा है,उसकी प्रकृति पर बात हो। ये तय हो कि ये आयोजन हिन्दी के मर जाने पर आयोजित होती है,उसके जिंदा रखने की कोशिशों के लिए होती है,उसके विस्तार को दिशा देने के लिए होती है या फिर हिन्दी के चंद खुर्राट पेशेवर लिफाफादर्शी लोगों के थकाउ भाषणों में प्रसव की गुंजाईश आजमाने के लिए होती है? अगर ये हिन्दी के नाम का सिलेब्रेशन है तो माफ कीजिएगा इसकी शक्ल ऐसी बिल्कुल नहीं हो सकती जो हमें हिन्दी पखवाड़े में दिखाई देती है।.ये बहुत ही व्यक्तिगत स्तर पर अपने आप सिलेब्रेट करनेवाली चीज है या फिर बहुत हुआ तो छोटे-छोटे समूहों में कविता,कहानी,संस्मरणों के अंशों को पढ़कर और उनके शब्दों के बीच अर्थों में डूबकर...
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मां रोज के मुकाबले आज कुछ ज्यादा परेशान थी। बातचीत में साफ झलक रहा था कि उसकी दिल्ली में बाढ़ को लेकर चिंता( मुझे लेकर,वैसे सचिवालय,विधान सभा डूब जाए क्या मतलब) बढ़ती जा रही है। पिछले चार-पांच दिनों से वो रोज पूछती- सुन रहे हैं दिल्ली में बाढ़ आ गया है और फिर कुछ सवाल। पहले एक दिन मजाक में कहा भी.हियां( गरमी से परान जा रहा है,भेज दो कुछ पानी इधरे) लेकिन बाद में न्यूज चैनलों ने बाढ़ की खबरों का जो तंबू ताना कि वो मजाक करना भूलकर चिंतिंत होने लग गयी। आज तो हद ही हो गयी। जब उसने चैनल में मयूर विहार का भी नाम सुन लिया। उसे मेरे रहने का इलाका ठीक से पता नहीं था लेकिन हाल ही पता लिखाने के दौरान उसे याद हो आया था।

 झूठ्ठा- और कोई नहीं मिला तो हमरे से झूठ बोल दिए कि सब ठीक है,हिआं टाटा स्काई पर दिखा रहा है कि जहां तुम रहते हो,हुआं(वहां ) भी बाढ़ आ गया है। तुमको बोले थे उ दिन कि इंडिया टीवी में सब देखा रहा है तो तुम बोले कि दू कौड़ी का चैनल है,मत देखा करो उसको,सब बकवास देखाता है। आज तो स्टार न्यूज भी यही सब देखा रहा है औ उ दाढ़ीवाला भी बोल रहा था कि आ गया है बाढ़। बता रहा था कि सब डूब गया,तब तो खाय-पिए में बड़ी दिक्कत हो जाता होगा बेटा,सर-समान ठीक से रखना।                                                                                    मैंने मजे लेने शुरु कर दिए,मां को हल्का करने के लिए। कहा- कौन दीपक चौरसिया,वही कह रहे थे? अच्छा ये बताओ कि जब सबकुछ डूब गया तो फिर उनको एकदम से टीवी स्क्रीन में हेकड़ी दिखाने के लिए गुटखा कहां से मिल गया,देख नहीं रही थी..कैसे भसर-भसर चिबा रहे थे। मां लगातार बोले जा रही थी..तुम हमको बहलाते हो,जरुर संकट में हो,आवाजे से लग रहा है,माय का करेजा तुम कैसे समझोगे,है तीन-चार साल। समझ में आ जाएगा कि कैसन होता है माय-बाप का बाल-बच्चा के लिए दर्द।

दिल्ली में बाढ़ को लेकर मां सहित तीन अलग-अलग शहरों में बसी दीदी से बात होती रही। सबके साथ वही परिहास। दिल्ली का पानी यहां भेज दो,बहुत गर्मी है। लेकिन आज सब थोड़े-थोड़े चिंतिंत। मां जितनी तो नहीं लेकिन मेरी बातों पर पूरी तरह भरोसा भी नहीं नहीं और बेफिक्र भी नहीं। मैंने सबों से यही कहा कि सबसे ज्यादा बाढ़ न्यूज चैनलों पर आया है। अगर मेरा बस चलता तो स्टोरी करता- फिल्म सिटी में हाहाकार,कौन है जिम्मेदार? डूब गया फलां चैनल का न्यूजरुम,छतरी लगाकर कर रहे हैं एंकरिंग। लेकिन क्या करें? सबों की एक ही लाइन,फिर भी- तुम सब बात हंसी में टाल देते हो,ध्यान रखना। आज तो सीरियसली सबने दिखाया है।

ये कहानी सिर्फ मेरी और मेरे घर के लोगों की चिंता को लेकर नहीं है। संभव है मेरी तरह अकेले दिल्ली में रहनेवाले लोगों के घर से भी लगातार फोन आ रहे होंगे,घर के लोग परेशान होंगे। वो बिहार-झारखंड,यूपी देश के दूरदराज इलाके में बैठकर न्यूज चैनल्स देख रहे हैं,उन्हें कैसे समझाया जाए कि दिल्ली में बाढ़ से ज्यादा चैनलों में एडीटिंग मशीन की संतानों की कारस्तानी है। वो अपनी पीटूसी पर लट्टू हुए जा रहे होंगे और यहां है कि लाखों-हजारों परिवार के लोगों की जान अटकी हुई होगी। उन्हें इन सबसे क्या मतलब? वो एक टीवी कर्मचारी होने के अलावे किसी का बेटा,किसी के भाई,किसी के पति,किसी के देवर थोड़े ही है? उनके पीछे उन्हें याद करनेवाला,रोनेवाला थोड़े ही है?..और अगर है भी तो देख ही रहे होंगे कि मेरा बेटा कैसे शान से केसरिया रंग का डूबने से बचनेवाला जैकिट पहनकर हीरोगिरी कर रहा है,वोट में बैठकर सैर कर रहा है और जो कुछ भी कविता-कहानी बांच रहा है उसको लाखों लोग आंख गड़ाकर सुन-देख रहे होंगे? इंडिया टीवी की क्या कहें- बाढ़ वाली दिल्ली की दस कहानियां। इस चैनल को दस का अंक लगाने की ऐसी लत लगी है कि लगता है दाती महाराज ने सलाह दी है,हर बात में दस..दस चुलबुल पांडे तक।.हद है।.

ऐसी स्थिति में हम और बाकी लोग अपने घर के लोगों को टेलीविजन की उन बारीकियों को नहीं समझा सकते,जहां पर वो निरा चिरकुटई का काम करते हैं। शाम को स्टार न्यूज जिसने कि बाढ़ की खबरों को लेकर सबसे ज्यादा तंबू खड़ा किए हुए है,उसके दर्जनभर संवाददाता इसी काम में लगे हुए हैं कि वो दिल्ली के कुछ इलाकों में घुस आए पानी को कोसी के कहर से भी बड़ा दिखाएं-बताएं-उनकी बेशर्मी चरम पर है। एक संवाददाता प्रफुल्ल श्रीवास्तव तो भी- मोटर लगी नाव में खड़ा है-चारो तरफ पानी है। जाहिर है ये इलाके के भीतर का पानी नहीं है-वहीं से खड़े होकर चारों तरफ के उन इलाकों को डूबा हुआ बता रहा है जहां कि सड़के सूखी है। वो प्रोपर्टी डीलर की तरह हाथें फैलाता है-ये देखिए,इधर डूबा,वो देखिए सब डूबा।.वो जहां खड़ा है वहां की पूरी चौहद्दी को डूबा करार दे रहा है। जब शहर को डूबा हुआ ही दिखाना है तो लोकेशन वाइज मैंदान में उतरकर बात करो न। तुम पेड़ की तरफ इशारा किए और कह दिया-ये रहा निगम बोधघाट और हम मान लें।.. गदहे हैं क्या? उसी चैनल का संवाददाता वही काम कर रहा है जबकि फुटेज में चैनल की ओबी दिख रही है जिसके टायर तक डूबे नहीं है। लोकेशन को लेकर चैनल जो घपलेबाजी कर रहा है,वो आम ऑडिएंस के बीच आतंक से कम दहशत पैदा नहीं कर रहा। मयूर विहार में पानी,डूब गया।..तो भाई कौन सा इलाका,माचिस की डिबिया है क्या मयूर विहार? प्रोपर्टी के लिए इंच-इंच की मारकाट मची होती है और आप हो कि राउंड फीगर में सब बता रहे हो। हमें ये बात समझ आ रही है कि ये चैनल ऐसा क्यों कर रहा है?    
            
 आजतक ने कल से जो ऑपरेशन हे राम जिसमें आशाराम बापू से लेकर दाती महाराज,सुधांशु महाराज, महाकाल सब लपेटे में आ गए हैं,उससे चैनल को अच्छी टीआरपी मिलनी लगभग तय है। इधर  इंडिया टीवी ने लीग मैच पूरी लाइव दिखायी थी और एंकर ने हिन्दी में कमेंटरी कर दी,ये न्यूज चैनल पर क्रिकेट को पेश करने का नया तरीका था,अब इस चैनल के पास भी अच्छी टीआरपी आनी चाहिए। अब स्टार के पास क्या बचता तो बस खेल गए दिल्ली में बाढ़ और पल-पल की खबर पर। अश्लील तो तब लगा जब संवाददाता ने कहा कि आज दोपहर तक कॉमनवेल्थ के फ्लैट्स जहां बने हैं दोपहर तक पानी नहीं था और जब प्रत्यक्षदर्शी से बोलने कहा तो उसने बताया कि सुबह चार बजे ही पानी घुस आया था। फील्ड में अपने को चमकाने की बेहूदा हरकतें लाखों ऑडिएंस के जीवन को किस तरह प्रभावित करती है,इसका कोई अंदाजा इन्हें नहीं है। खबरों के पीछे का समाजशास्त्रीय विश्लेषण पूरी तरह मर गया,उसका गला घोंट दिया गया है। टीआरपी आ जाने की स्थिति में वो ठहाके लगाएंगे- अच्छा खेल गए हम इस बाढ़ पर। संभव है अबकी बार फिर बाढ़ की स्टोरी पर किसी को पॉलिटिकल कैटेगरी में गोयनका अवार्ड मिल जाए। लेकिन, जिस अंदाज में वो दिल्ली में बाढ़ की खबरें दिखा रहे हैं वो खबरें देने का काम कम,डराने का काम ज्यादा कर रहे हैं। उनके लिए बाढ़ का आना उत्सव है, पानी का उतरना मातम। लेकिन शायद वो ये नहीं समझ पा रहे हैं कि इस अफरा-तफरी में लोगों से टीवी देखना ही छूट गया तो टीआरपी के बदले क्या आएगा- घंटा?

मां को कई तरह से आश्वस्त किया। इतना तक कहा कि जब बाढ़ से ही डूबकर मरना है तो बिहार-झारखंड ही ठीक है न। घर छोड़कर इतनी दूर आए हैं,दिल्ली में कुछ करने आए हैं,कुछ और नहीं तो बाढ़ में डूबकर मरेंगे क्या? मां तुम टेंशन मत लो और हां एक काम करो,मैं तुम्हें सास-बहू सीरियलों के अलावे कुछ इधर-उधर मतलब न्यूज चैनलों को भी देखने की जो राय देता रहा,उसे भूल जाओ। तुम सास-बहू ही देखती रहो। हम तुमसे इसी पर बात करेंगे कि लाडो की सिया कैसे धीरज को बचा पाएगी, उतरन की तपस्या फिर किसके जाल में फंसेगी,गीत का सपना पूरा होगा भी या नहीं, ललिया की यादाश्त वापस आएगी कि नहीं? मां,अगली बार फोन पर यही सब बात करुंगा,एपीसोड देखकर तैयार रहना..

नोट- चैनलों की इस गंध मचाने,बाढ़ के नाम पर रायता फैलाने की तरफ वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने भी फेसबुक पर नोटिस ली है- दिल्ली के एक हिस्से में यमुना बहती है। उसके आसपास रहने वाले कुछ इलाकों में पानी भर गया है। इनसाइट फाउंडेशन के मित्र अनूप कुमार ने अपनी मां को मैसेज भेजा है कि ज्यादा परेशान न हों और हो सके तो न्यूज चैनल कम देखें। दिल्ली का राष्ट्रीय मीडिया दिल्ली-मुंबई को लेकर जिस तरह पगलाया हुआ है, वह उसके राष्ट्रीय होने पर सवालिया निशान खड़ा करता है। कोशी की बाढ़ में 15000 लोगों के मरने से बड़ी है यमुना की बाढ़! शर्म...शर्म।
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सबलोग पत्रिका ने अगस्त-सितंबर के अंक का बड़ा हिस्सा मीडिया को दिया है जिसमें दर्जन भर से ज्यादा लेख मीडिया के अलग-अलग संदर्भों को लेकर है। आज मीडिया पर लिखने के लिए मुद्दों की कमी नहीं है लेकिन जो सबसे जरुरी मुद्दा मुझे समझ आता है वो ये कि वर्चुअल स्पेस पर मीडिया को जिस तरीके से देखा-समझा जा रहा है,उस पर बात शुरु की जाए। लिहाजा इसी नीयत से मैंने ये लेख पत्रिका के लिए भेजी। प्रकाशित होने के बाद अब आपके सामने-

 न्यूज चैनलों पर हमला होते ही टेलीविजन पर बात करने का हमारा नजरिया एकदम से बदल जाता है। हम सालभर तक जिन चैनलों की आलोचना सरोकारों से कटकर भूत-प्रेत, पाखंड, सांप-सपेरे और मनोरंजन चैनलों की फुटेज काटकर घंटों चलाते रहने के कारण करते हैं, उन्हीं चैनलों पर जब कभी भी हमले होते हैं, हम एकदम से उनके साथ खड़े हो लेते हैं। चैनलों की ओर से अपने उपर हुए हमले को लेकर जो भी खबरें और पैकेज दिखाये-बताये जाते हैं, उसे लेकर हमारे बीच कई स्तरों पर असहमति होती हैं। वे जो इसे सीधे तौर पर लोकतंत्र पर हमला,कुचलने की कोशिश बताते हैं, हम इसे जनमाध्यमों के बीच पनप रहा पाखंड मानते हैं। लेकिन यहां हम माध्यमों के चारित्रिक विश्लेषण में फंसने के बजाय सीधे तौर पर चैनल का समर्थन करते हैं। इससे अलग प्रिंट माध्यमों में मीडिया पर हमले को लेकर बहुत ही कम देखने-पढ़ने को मिल पाता है।
 मेनस्ट्रीम मीडिया से अलग वर्चुअल स्पेस पर मीडिया और टेलीविजन को लेकर अपनी बात रखनेवाले हम जैसे लोगों की कोशिश होती है कि हमले की बात जल्द से जल्द और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे। हम इस बात पर यकीन रखते हैं कि हमारा काम गहरे विश्लेषण से पहले वर्चुअल स्पेस पर हिन्दी और मीडिया के ज्यादा से ज्यादा पन्नों और लिंक पैदा करना है जिससे कि तमाम दूसरे माध्यमों से जुड़े लोग सर्च इंजन में चैनल के नाम के साथ अटैक या हमला लिखें तो उन्हें कई लिंक मिलने लग जाएं।

16 जुलाई शाम के करीब पांच बजे आरएसएस के हजारों कार्यकर्ताओं ने आजतक न्यूज चैनल के दिल्ली ऑफिस करोलबाग पर हमला कर दिया,वहां जमकर तोड़-फोड़ मचायी और कॉफी हाउस को बुरी तरह तहस-नहस कर दिया। तब इंटरनेट पर हमले को लेकर कोई खबर नहीं थी। चैनल की ऑफिशियल साइट पर चार-पांच लाइनों से ज्यादा कुछ नहीं। हम बज्ज, फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग पर लगातार सक्रिय हो जाते हैं। इस खबर को लेकर कई लिंक पैदा करना चाहते हैं। ऐसा करते हुए हमें सबसे ज्यादा जरुरी लगता है कि हमले की वीडियो फुटेज दुनियाभर के लोगों के बीच जानी चाहिए और तब टेलीविजन से रिकार्ड करके एक-एक फुटेज यूट्यूब पर अपलोड करते चले जाते हैं। दो घंटे के भीतर यूट्यूब की इस लिंक पर साठ से ज्यादा विजिट होते हैं। उस समय से लेकर सुबह तक ब्लॉग पर दर्जनों कमेंट आ जाते हैं और ब्लॉग पर लिखी पोस्ट दूसरी साइटों पर साभार के साथ लग जाती है। बाकी जगहों पर भी रिस्पांस मिलने शुरु हो जाते हैं और इस तरह तात्कालिक पक्षधरता का यह काम,चैनल की संस्कृति और उसके भीतर लोकतंत्र के चरित्र के विश्लेषण से बहुत पहले हो चुका होता है।
हम हमले का विरोध करते हुए किसी न किसी रुप में न केवल चैनल के पक्ष में माहौल बनाने का काम करने लग जाते हैं, बल्कि जो काम चैनल के लोग मोटी तनख्वाह लेकर करते हैं,उसे हम अपने-अपने घुप्प अंधेरे कमरों में बैठकर करते हैं। यह बिल्कुल ही नए किस्म का टेलीविजन विमर्श है जिसकी आलोचना करते हुए भी उसका विस्तार देने का काम हजारों वेब लेखक लगातार कर रहे हैं।                                                  दूसरी तरफ प्रिंट माध्यमों में टेलीविजन पर जो कुछ भी लिखा जाता है उनमें से अधिकांश को पढ़ते हुए साफ तौर पर लगता है कि यह गैरजरुरी माध्यम है, भ्रष्ट है और इस पर लिखा ही इसलिए जा रहा है कि लिख-लिखकर इसे नेस्तनाबूद् कर देना है। इस नजरिए के साथ टेलीविजन और मीडिया पर लिखने का ही नतीजा है कि कार्यक्रमों की प्रकृति,दिखाए जाने के तरीके और तेजी से बदलती तकनीक और विस्तार के वाबजूद विश्लेषण के तरीके में बहुत फर्क नहीं आया है। पूरे टेलीविजन विश्लेषण में दो तरह की ही सैद्धांतिकी या अवधारणा काम करती है। एक जो कि बिल्बर श्रैम ने विकासशील देशों के लिए माध्यम का काम अनिवार्य रुप से सामाजिक विकास की गति में सहयोग करना है और दूसरा मार्क्सवादी समीक्षा जिसके अनुसार टेलीविजन एक पूंजीवादी माध्यम है इसलिए ये सरोकार और जनपक्षधरता की बात नहीं कर सकता। टेलीविजन को लेकर यह समझ पैदा करने में शुरुआती दौर में अडोर्नों, अल्थूसर,रेमंड विलियम्स,मार्शल मैक्लूहान और जॉन फिस्के जैसे मीडिया और संस्कृति आलोचकों से मदद मिली तो बाद में इलिहू कर्ट्ज,मैनचेस्नी और संस्कृति के मामले में एक हद तक फीदेल कास्त्रों के लेखन के आधार पर सैद्धांतिकियां विकसित की गयी। खासकर हिन्दी में टेलीविजन और मीडिया विश्लेषण की बात करें तो यही आधार के तौर पर स्थापित हैं। यह अलग बात है कि इनमें से कई सिद्धांत सीधे-सीधे मीडिया से नहीं जुड़ते हैं जबकि मीडिया समीक्षा के दौरान मीडिया,संस्कृति और समाज सबों को एक ही मान लिया जाता है। इन सैद्धांतिकियों का प्रयोग खासतौर पर निजी चैनलों की आलोचना के लिए की जाती है। इसके साथ ही बिल्बर श्रैम ने जो सिद्धांत बताए,जिसका बड़ा हिस्सा यूनेस्को और बाद में प्रसार भारती ने अपनाया,उसके तहत पूरी मीडिया संस्कृति को देखने-समझने का काम किया जाता रहा है। सच्चाई है कि इन सारे सिद्धांतों में पहले के मुकाबले बहुत अधिक विकास हुआ है,इसकी बुनियादी मान्यताओं के नए संस्करण बने हैं। पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग के मामले में तो फिर भी ये विकासवादी सिद्धांत एक हद तक काम में आ सकते हैं लेकिन कॉर्पोरेट मीडिया को इन सिद्धांतों के जरिए विश्लेषित कर पाना असंभव है। हिन्दी में मीडिया विश्लेषण सिद्धांतों के इन पुराने संस्करण से बाहर नहीं निकल पाया है।

वर्चुअल स्पेस में खासकर हिन्दी में मीडिया और टेलीविजन को लेकर विमर्श अपने शुरुआती दौर में है। अभी तक जो भी और जितना भी लिखा गया है उस आधार पर किसी भी तरह के बड़े दावे करना बेमानी होगी। हम अभी यह कहने की स्थिति में नहीं है कि इसने किसी तरह की नई मीडिया सैद्धांतिकियों को गढ़ लिया है और यह भी नई कह सकते है कि यह अब तक की विश्लेषण पद्धतियों को शिकस्त देने की रणनीति बना चुके हैं। लेकिन इतना जरुर है कि वर्चुअल स्पेस पर मीडिया लेखन का जो दौर शुरु हुआ है उसमें विश्लेषण की बारीकियों के चिन्ह साफ तौर पर दिखाई देते हैं।
प्रिंट माध्यम का लेखन जहां टेलीविजन के सारे कार्यक्रमों को मिलाकर जहां एक गोल-मोल समझ पैदा करने की प्रक्रिया में होता है वहीं वर्चुअल स्पेस पर एक-एक कार्यक्रम को लेकर विश्लेषण पद्धति खोजने और गढ़ने की प्रक्रिया जारी है। दिलचस्प है कि साहित्य,सिनेमा,कला आदि की दुनिया में किसी एक शख्सियत और उनके काम को लेकर लिखने की लंबी परंपरा रही है लेकिन टेलीविजन विमर्श में यह नदारद है। किसी एक प्रोड्यूसर, कैमरामैन,रिपोर्टर का व्यक्तिगत स्तर पर कोई जिक्र नहीं। रियलिटी शो पर बात करते हुए वही फार्मूले चिपकाए जाते हैं जिसके तहत हम टीवी सीरियलों की बात करते हैं,न्यूज चैनल की प्रकृति मनोरंजन चैनलों की प्रकृति से बिल्कुल अलग होनी चाहिए लेकिन सबकुछ कुछ जार्गन और शब्दों के बीच फंसा हुआ है। इसके साथ ही एक-एक खबर को लेकर चैनलों का क्या रवैया रहा,उसके लिए किस तरह के मोंटाज,सुपर,हेडर लगाए गए,इन सबकी चर्चा बारीकी से होनी चाहिए। वर्चुअल स्पेस में प्रोडक्शन की पूरी प्रक्रिया के बीच में रखकर टेलीविजन और उसके कार्यक्रमों को देखने की कोशिश विश्लेषण की एक नयी समझ पैदा करती है।
ऐसा होने से टेलीविजन और मीडिया को लेकर विमर्श का जो दायरा कंटेंट से शुरु होकर कंटेंट पर जाकर ही खत्म हो जाया करते, आलोचना का अर्थ पूरी तरह प्रभावों की चर्चा तक जाकर सिमट जाती है,यहां तकनीक और रिवन्यू के बीच फंसी मीडिया को देखने-समझने की कोशिशें तेजी हुई है। यहां चुनौती इस बात को लेकर नहीं है कि मीडिया की जो सैद्धांतिकियां पहले से स्थापित है,उसके खांचे में रखकर विश्लेषण का काम कैसे किया जाए बल्कि चुनौती इस बात को लेकर है कि मीडिया की कार्य-संस्कृति और उसकी शर्तों को समझते हुए( जिसमें की तकनीक से लेकर अर्थशास्त्र के मसले शामिल हैं) उसके भीतर की संभावनाओं को कैसे बचाया जा सके,विस्तार दिया जा सके। ऐसे में आज यदि  हम वर्चुअल स्पेस पर विमर्श के इन तरीकों को मजबूती दे रहे हैं तो यह बहुत हद तक संभव है कि एक बड़ा सवाल पैदा हो कि ऐसा करते हुए भी हम चैनल की जड़ों को मजबूत कर रहे हैं,उनके पक्ष को ही मजबूती दे रहे हैं और इस तरह किसी न किसी तरह से बाजार,पूंजीवाद औऱ कार्पोरेट ताकतों से लैस मीडिया के साथ खड़े हैं। लेकिन इसके साथ ही एक सवाल यह भी है कि प्रिंट माध्यमों की टेलीविजन समीक्षा कितनी व्यावहारिक और विश्वसनीय है? यह सवाल इसलिए भी जरुरी है कि आलोचना का अर्थ किसी विधा को विकसित करते रहना भर नहीं है बल्कि जिस विधा या क्षेत्र को लेकर आलोचना की जा रही है उस पर असर भी पैदा करना है। ऐसे में वर्चुअल स्पेस पर हो रहे टेलीविजन और मीडिया विमर्श के बीच से व्यावहारिक समीक्षा के सूत्र खोजे जा सकते हैं,इस पर भी बात होनी चाहिए।
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आजतक पर टीआरपी की चाबुक लगातार चल रही है और वो पछाड़ खाकर गिर रहा है। जिस टीआरपी के बक्से ने उसे मीडिया इन्डस्ट्री का बेताज बादशाह बनाया,पिछले कुछ हफ्तों से वही उसकी चमड़ी उधेड़कर रख दिया है। पहले से ही लहूलूहान हुए इस चैनल पर इन्डस्ट्री के अनुभवी पत्रकार नागार्जुन(बदलता हुआ नाम) मरहम-पट्टी करने के बजाय उनके जख्मों को और हरा कर दिया। उन तमाम मसलों पर बेबाकी से बात की जिसकी वजह से आजतक की ये हालत हुई है। नागार्जुन की नींबू निचोड़ शैली में अपनी बात रखने के बाद कहने को कुछ रह नहीं जाता लेकिन जो मसला हमें जरुरी लगा उसे मैंने आज मोहल्लालाइव पर शेयर किया। वो कमेंट और पोस्ट की शक्ल में मौजूद है। लिहाजा ये पोस्ट आपसे साझा कर रहा हूं-

डिस्ट्रीब्‍यूशन के सवाल पर हमें जो जानकारी मिली उसके अनुसार हमसे ही सवाल किया गया – आनेवाले पंद्रह दिन आजतक के साथ ऐसा ही रहेगा, पता है क्यों? मैंने कहा – नहीं, मुझे नहीं पता। विश्‍लेषण के आधार पर जो अटकलें लगा सकता था, उसे मैंने सामने नहीं रखा था। उनका जबाब था – डिस्ट्रीब्यूशन। आजतक ने अपना डिस्ट्रीब्यूशन दिल्ली सहित दूसरे शहरों में कम करके साउथ की तरफ इसे बढ़ाया है और बढ़ाने जा रहे हैं। आनेवाले समय में वो कुछ और चैनल उधर लांच करेंगे।
उनके हिसाब से आजतक की जो हालत हुई है, वो जान-बूझकर हुई है और आजतक के लोग भी इसे जानते हैं। ये तो बाहर के लोग बेवजह हो-हल्ला मचा रहे हैं। लेकिन किसी के लिए भी ये बात समझ से परे है कि कोई भी चैनल जमी-जमायी रिच को उखाड़कर दूसरी जगह डिस्ट्रीब्यूशन पर ध्यान जमाएगा। टीआरपी की शर्त पर दूसरे नये वेंचर नहीं खड़े किये जा सकते। ये इनहाउस संतोष कर लेने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है लेकिन आजतक की गिरती हालत को डिस्ट्रीब्यूशन की बहानेबाजी के तहत नहीं धकेला जा सकता है। हां, ये जरूर है कि अगर आजतक आनेवाले समय में मामूली रिसोर्सेज बढ़ाते हुए (जिसमें ट्रांस्पॉन्डर स्पेस भी शामिल हैं) नये वेंचर खड़ा करने की कोशिश करता है, तो परेशानी हो सकती है।
इसी क्रम में जो एक सवाल जो कि संभव है, थोड़ा सब्जेक्टिव हो वो ये कि अब आजतक के लोगों के बीच काम करने का उत्साह पहले जैसा नहीं रह गया है। उन्हें अब महसूस नहीं होता कि वो देश के सबसे बेहतर चैनल, सबसे तेज चैनल और नियम-कायदे से चलनेवाले चैनल में काम कर रहे हैं। नंबर वन बनाये रखने का जज्बा उनके भीतर से लगातार मर रहा है, जिसकी एक वजह तो ये कि इसे लीड करनेवाले लोग उन्हें अपने फैसले से जोश में बनाये रखने की स्थिति में नहीं हैं और दूसरी वजह जो कि ज्यादा ठोस हो सकती है – चार साल से कोई इनक्रीमेंट नहीं। इस साल एप्रेजल मिलेगा, अबकी बार तो पक्का, फिर आर्थिक मंदी का हवाला, फिर उबरने की कोशिशों के बीच चार साल तक लोगों ने बर्दाश्त किया। अब कोई जेनुइन वजह नहीं रह गयी और लोगों के बीच गहरा असंतोष है।
जेनुइन वजह तो तब भी नहीं थी जब विश्व आर्थिक मंदी का दौर चल रहा था। केपीएमजी की वार्षिक रिपोर्ट पर गौर करें, तो बाकी सेक्टर के मुकाबले इस सेक्टर पर कम असर हुआ। अगर आप टीवीटुडे नेटवर्क की बैलेंस सीट से मिलान करें तो संभव है कुछ वैसे ही नतीजे सामने आएंगे कि हाउस को कोई नुकसान नहीं हुआ। हां अनुमान लगाया जा सकता है कि इसी दौरान संस्थान ने नये वेंचर खड़ा करने और उसे विस्तार देने के फैसले लिये, इनवेस्ट किया। इसका मतलब कोई चाहे तो आसानी से निकाल सकता है कि जो पैसे वहां के लोगों के इनक्रीमेंट के खाते में जाने चाहिए थे, उसे वेंचर को विस्तार देने के काम में लगाया गया। ये तस्वीर अमिताभ के सिनेमा में मिल मजदूरों की दिखायी गयी हालत से कुछ अलग नहीं है। आर्थिक स्तर पर पूंजीवाद से कार्पोरेट में घुस आया हमारा विकास भले ही ज्यादा चमकीला दिखाई देता हो लेकिन शोषण का असर पूंजीवाद से कम बदतर नहीं है।
अब स्थिति ये है कि मीडिया इंडस्ट्री के भीतर का जो माहौल है, उसमें कोई भी सेफ जोन में नहीं है। वीओआई जैसे टाइटेनिक जहाज के डूबने, पीटर मुखर्जी के आइनेक्स को जहांगीर पोचा जैसे शख्स के हाथों बेचने, न्यूज24 के लड़खड़ाने जैसे मामलों के बीच लोगों को ये समझ आने लगा है कि महज पूंजी के बल पर मीडिया का धंधा करना आसान काम नहीं है। इस बीच बड़े-बड़े नामों के धुर्रे उड़ गये। जो कभी ऑडिएंस के दिलों पर राज करते रहे, कलेजे पर सवार रहे, उनका आज कोई नामलेवा नहीं है। किसी बड़े बाबा का हाथ थामकर आंख मूंदकर दूसरे चैनल में कूदने से क्या हश्र होता है, ये लोग पंडिजी के साथ जाकर लोग झेल चुके हैं और उसके शिकार अभी भी लोग भटक रहे हैं। कुल मिलाकर इंडस्ट्री के भीतर स्थिति इतनी आसान नहीं है कि कोई कहीं भी छोड़कर आसानी से चला जाए और वो भी आजतक से… तो सवाल है कि आदमी करे तो क्या करे? चार साल से जो जहां जिस पगार पर काम कर रहा है, कर रहा है। इन तीन-चार सालों में एक बड़ा मिथक टूटा है कि मीडिया इंडस्ट्री में अथाह पैसा है। ये बात कम से कम निचले और बीच के स्तर के लोगों पर तो अब लागू नहीं ही होती।
आजतक शुरू से दूरदर्शी चैनल रहा है। उसे इस बात का शुरू से आभास रहा है कि आनेवाले समय में टीमें टूट सकती हैं, लोग बिखर सकते हैं इसलिए जानकारी ही बचाव की तर्ज पर उसने अपनी नर्सरी में ही आजतक के मीडियाकर्मियों की पौध तैयार करनी शुरू की। टीवीटीएमआइ के जरिए हर साल 25-30 ऐसे मीडियाकर्मी तैयार किये जाते रहे हैं जो कि इंट्री के पहले दिन से ही टीआरपी के बताशे बनाने के बीच सांस लेना शुरू कर देते हैं। ये कितने काबिल मीडियाकर्मी हैं और होंगे (चार साल में हमने यहां से निकले एक का भी नाम नहीं सुना), इस बहस में न भी जाएं तो भी टीआरपी का खेल भंडुल न हो, इसकी तैयारी चैनल ने पहले से कर रखी है। यहां आनेवाला शख्स इस बात से खुश होता है कि करीब डेढ़ लाख देकर वो देश के सबसे तेज चैनल का मीडियाकर्मी बन ही जाएगा। असल जिंदगी में वो सबसे लद्धड़ भी रहा, तो फर्क नहीं पड़ता। जिस कॉनफ‍िडेंस के साथ वो ट्रेनी के कार्ड से चैनल का दरवाजा खोलता है, अच्छे से अच्छा पुराना मीडियाकर्मी उसके आगे मद्धिम पड़ जाए। वैसे भी जहां दूसरे संस्थान इससे कहीं अधिक पैसे लेकर इंटर्नशिप तक की गारंटी नहीं देते, उस लिहाज से तो ये इंस्‍टीट्यूट अच्छा ही है न।
लेकिन, यहां से पासआउट लोगों की हालत तो ऊपर के कसमसा रहे मीडियाकर्मियों से भी बदतर है। आये दिन खुलनेवाले नये चैनलों के झांसे में ही आकर सही, वो आजतक के नाम पर दूसरे चैनलों के बड़े पद पर फिर भी जा सकते हैं, चैनल लांच करानेवाली टीम का सेहरा अपने ऊपर बांध सकते हैं लेकिन इस संस्थान के लोग तीन साल से पहले कहीं नहीं जा सकते। इन्हें जो रकम इस दौरान दी जाती है और जिस कॉन्ट्रेक्ट पेपर पर साइन कराये जाते हैं, वो पीपली लाइव के सीन की याद दिलाता है। नत्था को लालबहादुर दिया जाता है। लालबहादुर यानी हरे रंग का एक चापानल। जो रंग नत्था के चेहरे पर हरियाली बिखेरने के बजाय चिंता बिखेरता है। पेपर पर अंगूठा लगाने के बाद वो आत्महत्या भी नहीं कर सकता, अगर करता है तो पैसे नहीं मिलेंगे। तो आजतक के भीतर एक बड़ी तादाद में लालबहादुर पा चुके मीडियाकर्मी काम कर रहे हैं, जिनका टीआरपी के बताशे बनाने में कितनी भूमिका है, नहीं पता – लेकिन उनकी हालत नत्था के करीब है।
इस तरह कहानी बनती है कि चैनल का बिजनेस, ब्रांडिंग और टीआरपी के लिहाज से जो हाल है, उसके लिए जिम्मेदार अगर मौजूदा टीम है, तो चैनल के लोगों की जो अंदरूनी हालत है, उसके लिए भी कौन जिम्मेदार है, इस पर बहस होनी चाहिए। बाहर से अनुमान लगाने की स्थिति में मेरी कई स्थापनाएं गलत हो सकती हैं, उसे आगे दुरुस्त किया जा सकता है। लेकिन आजतक के कई मिथक अगर टूटते हैं, सरकारी नौकरी की तरह ये निश्चिंत होकर काम करने का मीडिया संस्थान नहीं रह गया है तो इस मिथक के टूटने के तमाम कारणों पर भी विचार करने की जरूरत है। हम अपने सबसे पुराने चैनल को (कभी भी दूरदर्शन का दर्शक नहीं रहा, जिसके हिसाब से हम अपने उम्र की गिनती मिलाते हैं) इस तरह तार-तार होता नहीं देखना नहीं चाहते। इस लिहाज से इस पर बात करना, बहस करना जरूरी लगता है।
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मोहल्लालाइव पर एक पोस्ट के जरिए वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार राजकिशोर को बिका हुआ बताया गया। राजकिशोर के बारे में लिखा गया कि वो विभूति-प्रसंग पर विभूति नारायण राय के पक्ष में हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं। जिस विभूति के विरोध में देश के सैंकड़ों लेखक और लिटरेचरप्रेमी खड़े हैं,वो उनके बचाव के लिए खुलकर सामने आ गए हैं। राजकिशोर ने इस पोस्ट की प्रतिक्रिया में आज मोहल्लालाइव पर एक पोस्ट लिखी है और इन सारी बातों का जबाब देने के बजाय पाठकों से अतिरिक्त सहानुभूति बटोरने की कोशिश की है। राजकिशोर की बातों का कोई भी तार्किक आधार नहीं है। लिहाजा उनकी इस पोस्ट से भावुक तो हुआ जा सकता है लेकिन उनके डीफेंस में आने की स्थिति नहीं बनती। एक पाठक की हैसियत से जिसने की साढ़े तीन रुपये लगाकर जनसत्ता खरीदी और उनके लेखों को पढ़ा,मैं अपनी असहमति दर्ज करता हूं। ये जितना राजकिशोर के एक पाठक की असहमति है,उससे कहीं ज्यादा एक उपभोक्ता का अधिकार। कमेंट की शक्ल में ये मोहल्लालाइव पर मौजूद है लेकिन यहां बतौर पोस्ट आपके सामने-
राजकिशोरजी,
आपके अलावा बाकी लोगों को भी मैंने शुरु से ही उनके बारे में जानने से कहीं ज्यादा पढ़ना पसंद किया है। अगर मुझे लगा कि इन्हें पढ़ जाना चाहिए। एक हद तक मैंने उसी आधार पर उनके प्रति धारणा भी बनायी। फिलहाल इस बहस में न जाएं कि एक घोर सामंती भी मुक्ति की अगर रचना करे तो आप उसके प्रति कैसी धारणा बनाएंगे,इस पर फिर कभी।
आपकी मेहनत,काबिलियत,लगातार अपने को खराद पर घिसकर कमाने की आदत पर न तो हमें पहले कभी शक था और न ही अभी है। आप या कोई भी जीवन में रोजी-रोजगार के लिए किस तरह के माध्यमों का चुनाव करता है,ये उसका व्यक्तिगत फैसला है। संभव है इस देश में जूते गांठकर या फिर लॉटरी,शेयर की टिकटें और फार्म बेचकर कविताएं लिख रहा हो,कहानियां लिखता हो। इसलिए आप इस बहस में इन बातों को शामिल न करें,बहुत होगा तो इससे हम पाठकों पर आपके प्रति भावुकता, संवेदनशीलता या सहानुभूति का रंग पहले से और गाढ़ा होगा। आप ही नहीं हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य में कमोवेश सभी लोग इसी तरह से आगे बढ़ते हैं,उसी तरह का जीवन जीते हुए आगे जाते हैं।..लेकिन आपके इस हवाले से कहीं भी ये साफ नहीं होता कि आप सिद्धांतों के बजाय मूल्यों को जब चुनते हैं तो उसका आधार क्या हुआ करता है? माफ कीजिएगा,बहुत ही बेसिक बातें जब अवधारणा की शक्ल में गढ़ी जाने लगती है तो बेचैनी महसूस होती है। हम आपसे वो मानसिक प्रक्रिया की व्याख्या नहीं जानना चाह रहे जिसके तहत आप सिद्धांतों औऱ मूल्यों को अलग कर पाते हैं, फिर सिद्धांतों को साइड रहने को कहते हैं और मूल्यों का अंगीकार करते हैं।
जिस पोस्ट में आपको बिका हुआ बताया गया और कहा गया कि आप विभूति नारायण के पक्ष में हस्ताक्षर करवा रहे हैं,आपने आज की पोस्ट में कहीं एक लाइन में भी इसका खंडन किया कि नहीं आप ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं? और अगर कर रहे हैं तो उसके पीछे मूल्यों की वो कौन सी ताकतें हैं जो आपको विभूति के पक्ष में खड़े होने के लिए ज्यादा प्रेरित करती है। जिसके आगे सिद्धांत दौ कौड़ी की चीज बनकर रह जाती है? आपने इस मुद्दे पर सीरियसली( महसूस भले ही कर रहे हों) बात करने के बजाय हम पाठकों पर इमोशनल अत्याचार कर गए। कब तक हिन्दी समाज के बाकी लोगों की तरह उद्धव की ज्ञान की गठरी को भावना के आगे दो कौड़ी की चीज करार देते रहेंगे,ज्ञान की गठरी के आंधी में तब्दील होने और फिर कोरी भावुकता,छद्म की टांट उड़ने की भी तो कहानी बताया करें।
राजकिशोरजी,माफ कीजिएगा,अनुभव और समझदारी के स्तर पर मैं आपके आगे बहुत ठिगना हूं लेकिन इतना जरुर समझ पाता हूं कि कोई भी लेखक या पत्रकार किसी घोषणा के तहत नहीं लिखता कि वो कोई सिद्धांत गढ़ने जा रहा है। लिखते वक्त उसके सामने मूल्य ही सक्रिय रहते हैं जो मूल्य वगैरह बातों को बकवास मानते हैं उनके आगे संपादक की डिमांड,मानदेय आदि। लेकिन लिखते हुए वो मूल्य या फिर डिमांड एंड सप्लाय का लेखन एक समय के बाद एक सैद्धांतिक आकार तो ले ही लेता है न। अब ये सिद्धांत किसी भी लेखक के चुनाव करने या न करने का मसला नहीं रह जाता। ये एक ठोस आधार के तौर पर पाठकों के सामने काम करने लग जाते हैं। अब जो लेखक कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो का भावानुवाद,उसके सांचे में ही कविता,कहानी,उपन्यास लिखते हुए विचारों की वरायटी गढ़ रहा हो,उसकी बात थोड़ी अलग जरुर है.इसमें भी सिद्धांत का एक आधार तो जरुर बनता है जो कि उसे बाकी के लोगों से अलग करता है।
आपको पढ़ते हुए बहुत मोटी बात है जो कि किसी भी आपके रोजमर्रा लेख और रोजमर्रा पाठक के पढ़ने के दौरान समझ आ जाती है आप स्त्री मामले को लेकर काफी संजीदा है। आप भले ही इसे सिद्धांत न मानें लेकिन आपको देखने-समझने का एक सैद्धांतिक आधार स्त्री लेखन तो है ही न। अब आपको यहां आकर बताना होगा कि आपने किस मूल्य के तहत( सिद्धांत को तो पहले ही खारिज कर चुके है) विभूति-प्रसंग में जो कुछ भी हुआ,उसे आप किस मूल्य के तहत देखते हैं,उसके पक्ष में हैं? ये बहुत ही सपाट बात है जिसके लिए मुझे नहीं लगता कि आपको आरोपों की फेहरिस्त जुटाकर मामले को भटकाने की जरुरत होगी। वैसे लेख की शक्ल में तो पाठक कुछ भी पढ़ ही लेगा लेकिन यहां आकर आपको इसे लेख का मुद्दा नहीं एक सवाल के तौर पर लेना चाहिए।..सबकुछ छोड़कर और अंत में प्रार्थना की मोड में आ जाना तो हिन्दी समाज की आदिम प्रवृत्ति है ही जिससे आप भी न बच सकें।
आपसे सवाल करने की हैसियत मेरी बस इतनी है कि कई मर्तबा आपके लेख के लिए मैंने साढ़े तीन रुपये की जनसत्ता खरीदी है और मैंने जिस लेखक के लिए पैसे खर्च किए हैं,उनसे ये जानने का अधिकार तो रखता ही हूं। हिन्दी में ये बदतमीजी समझी जाएगी लेकिन बाजार की भाषा में ये एक उपभोक्ता अधिकार है।
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नहीं रहे गिरदा..

Posted On 03:16 by विनीत कुमार | 7 comments

इस अल्सायी और मेरे लिए लंबे समय से ह्रासमेंट में धकेलती आयी  दुपहरी में अविनाश ने जैसे ही बताया कि गिरदा नहीं रहे तो सोने-सोने को होने आयी आंखों में बरबस आंसू आ गए। अविनाश ने उनकी उन तस्वीरों की ताकीद की जिसे कि हमने दून रीडिंग्स के दौरान देहरादून में लिए थे। हमें एकबारगी अपनी गलती का एहसास हुआ कि हम क्यों एक ऐसे फोटो पत्रकार साथी के भरोसे रह गए जिन्होंने हमें इस बिना पर ज्यादा तस्वीरें नहीं लेने दी कि वो सब दे देंगे और दूसरा कि जो भी तस्वीरें ली उसे आज दिन तक भेजी नहीं। हम गिरदा की तस्वीरें खोजने की पूरी कोशिश में जुटे हैं।
गिरदा के बारे में न तो हमें बहुत अधिक जानकारी है और न ही वो जो अब तक गाते आए हैं,उसकी कोई गहरी समझ। कविता और गीत के प्रति एक नकारात्मक रवैया शुरु से रहा है इसलिए इसकी जानकारी मं शुरु से बाधा आती रही है। सुबह के विमर्श और तीन घंटे के लिए मसूरी से लौटने के बाद पेट में हायली रिच खाना गया तो न तो कुछ और सुनने की इच्छा हो रही थी और न ही कुछ कहने की। हम कुर्सी में धंसकर सोना चाहते थे,बैठना नहीं। तभी गिरदा दूसरे सत्र में मंच पर होते हैं। ये वो सत्र रहा जिसमें कि गिरदा सहित बाकी लोगों ने उत्तराखंड के लोगों के दर्द को गाकर या कविता की शक्ल में हमसे साझा किया। गिरदा ने जब गाना शुरु किया तो लगातार भीतर से आत्मग्लानि का बोध होता रहा। दो तरह की पनीर,करीब 80-90 रुपये किलो के चावल,रायता और तमाम रईसजादों का खाना खाकर जब हम जंगली साग रांधने(पकाने) की बात गिरदा के स्वरों में सुनने लगे तो ऐसा होना स्वाभाविक ही था। गिरदा के गीत सुनकर हमें उबकाई आने लगी। हमारा जिगरा इतना बड़ा तो नहीं कि लोगों के दर्द को सुनकर अपना सुख और प्लेजर को लात मार दें लेकिन उस समय जो खाया था,उसकी उबकाई हो जाती और फिर गिरदा को सुनता,तब उन गीतों के साथ न्याय हो पाता। गिरदा के गाने की जो आवाज थी,वो इतनी बारीक लेकिन दूर तक जानेवाली,इतनी दूर जानेवाली कि देहरादून,मसूरी की पहाडियों में जो वीकएंड,हनीमून मनाने आते हैं, गरीबी और भूखमरी पर विमर्श करने आते हैं,कॉर्पोरेट की टेंशन लेकर यहां चिल्ल होने आते हैं,उन सबके कलेजे में नश्तर की तरह चुभती चली जाए। वो अपने गीतों में हद तक लोगों के बेशर्म होने का एहसास भरते। गिरदा को सुनने से तिल-तिलकर मरते हुए गीतकार के सामने से गुजरने का एहसास होता जिसका हर अंतरा,हर मुखड़ा सुनने के बाद कब्र और नजदीक होती जाती। मफल्ड ड्रम की हर बीट जैसे मुर्दे को कब्र के नजदीक ले जाती है। उनको सुनने से ऐसा लगता था कु दूर कोई पहाड़ की तलहटी में ऐसा शख्स गा रहा है जिसके पेट तीर से छलनी हो और गले में खून जमा हुआ है।


डेढ़  से दो घंटे की सेशन में गिरदा को सुनकर हम सचमुच पागल हो गए थे। छूटते ही हमने तय किया कि उनके कुछ गीतों की हम अलग से रिकार्डिंग करेंगे। लोग उनकी सीडी,कैसेट निकालने की बात कर रहे थे लेकिन उसमें उलझनें जानकर हमने तय किया था कि कुछ नहीं तो रिकार्ड करके यूट्यूब पर डाल देंगे। मैं तब अकेले गिरदा के पास गया और कहा कि ऐसा कुछ करना चाहते हैं। वो बच्चे की तरह खुश हो गए। साथ में अविनाश भी ऐसा करने में बहुत उत्साह दिखाया। लेकिन हम दिल्ली आते-आते तक ऐसा नही कर सके। उस रात डिनर में गिरदा अपनी मौज में थे।  शेखर पाठक,पुष्पेश पंत और दिल्ली से गए तमाम साहित्यकारों के बीच वो उफान पर थे..सब तरह से। लेकिन हम उनका कोई भी गीत रिकार्ड न कर पाए।

देहरादून की होटल में देर रात हमने उनके लिए सिर्फ इतना लिखा- गिरदा ने हमें पागल कर दिया


तीन घंटे की थकान लेकर जब हम वापस होटल अकेता के सेमिनार हॉल में दाखिल हुए, तब गिरदा ने अपना जादू-जाल फैलाना शुरू ही किया था। गिरदा अपने गानों में उत्तराखंड के भूले-बिसरे चेहरों और यादों को फिर से अपनी आवाज के जरिये सामने लाते हैं। वो जब भी गाते हैं, उनकी आवाज पहाड़ी जीवन के संघर्षों को दर्शाती है। इन्होंने फैज की कई कविताओं का अनुवाद भी किया है। गिरदा ने जब हमें सुनाया कि चूल्हा गर्म हुआ है, साग के पकने की गंध चारों ओर फैल रही है और आसमान में चांद कांसे की थाली की तरह टंगा है, तो बाबा नागार्जुन आंखों के आगे नाचने लग गये। यकीन मानिए आप गिरदा को सुनेंगे तो पागल हो जाएंगे। मैं दिल्ली आते ही उनके गाये गीतों का ऑडियो लोड करता हूं।
लेकिन,हम उस दिन से लेकर आज दिन तक कोई ऑडियो अपलोड नहीं कर पाए। जब अब तक नहीं किया तो क्या कर पाएंगे? सोचता हूं तो लगता है कि हम गिरदा के कुछ गाने अगर रिकार्ड करते तो क्या खर्चा जाता। गिरदा तो हमसे लगातार बस बीड़ी मिलती रहने की शर्त पर गाने को तैयार थे..
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